ऐप्प मोदी 2.2 को क्या अपडेट चाहिए?

मोदी 2.0 में हमने उस मोदी को देखा, जो मुख्यमंत्री की कुरसी छोड़ प्रधानमंत्री के सिंहासन का दावेदार था. जिसने अपने चुनाव-प्रचार में ख़्वाबों के ख़ूबसूरत सिलसिले सजाये और दूर तक निगाहों में करिश्मों के गुल खिला दिये. और मोदी 2.1 की शुरुआत भी उतनी ही करिश्माई, उतनी ही धमाकेदार हुई जब अपने शपथग्रहण समारोह में नरेन्द्र मोदी ने सार्क प्रमुखों को मेहमान बना लिया. फिर लोगों ने मोदी के विदेशी दौरों की रफ़्तार देखी, विदेश नीति की नयी धार देखी, लेकिन आज ज़्यादातर देशी-विदेशी समीक्षक इसी बात पर हैरान हैं कि घरेलू मोर्चे पर मोदी की रफ़्तार अकसर क़दमताल जैसी क्यों रही? आख़िर क्यों मोदी 2.1 से लोगों की वह उम्मीदें नहीं पूरी हुईं, जो उन्होंने लगायी थीं. और अब 26 मई 2015 के बाद ‘ऐप्प’ मोदी 2.2 में क्या अपडेट होने चाहिए. एक विश्लेषण.

मोदी 2.1 पर तो ख़ूब बहस हो चुकी. बहस अभी और भी होगी. सरकार का पहला साल कैसा बीता, मोदी सरकार अपनी कहेगी, विरोधी अपनी कहेंगे, समीक्षक-विश्लेषक अपनी कहेंगे, बाल की खाल निकलेगी. लेकिन क्या उससे काम की कोई बात निकलेगी? मोदी सरकार के पहले साल पर यानी मोदी 2.1 पर हमें जो कहना था, हम पहले ही कह चुके. अब आगे बढ़ते हैं. यह डिजिटल ज़माना है. हर ऐप्प आजकल महीनों में नहीं, अकसर दिनों में अपने आपको अपडेट करता है. तो 26 मई 2015 के बाद ‘ऐप्प मोदी’ 2.2 क्या अपने आपको अपडेट करेगा या वैसे ही चलेगा, जैसे अभी तक चल रहा है!

क्या उम्मीद करें मोदी 2.2 से?

इसलिए अब सवाल है कि मोदी 2.2 से हम क्या उम्मीद करें? मोदी को इतिहास ने एक दुर्लभ मौक़ा दिया है. वह इसे बना भी सकते हैं और बिगाड़ भी. राजनीतिक स्थिति उनके एकदम पक्ष में है. अच्छा बहुमत है, विपक्ष बहुत कमज़ोर है. राहुल गाँधी ने कुछ हाथ-पैर तो चलाने शुरू किये हैं, लेकिन अगर यूपीए-2 की तरह ख़ुद मोदी ही अपने आपको हराने के लिए काम न करने लगें, तो आम तौर पर 2019 में भी उनके सामने कोई चुनौती होगी, इसके आसार कम हैं. इसलिए मोदी का रास्ता तो काफ़ी साफ़ है. मोदी 2.0 में हमने उस मोदी को देखा, जो मुख्यमंत्री की कुरसी छोड़ प्रधानमंत्री के सिंहासन का दावेदार था. जिसने अपने चुनाव-प्रचार में ख़्वाबों के ख़ूबसूरत सिलसिले सजाये और दूर तक निगाहों में करिश्मों के गुल खिला दिये. और मोदी 2.1 की शुरुआत भी उतनी ही करिश्माई, उतनी ही धमाकेदार हुई जब अपने शपथग्रहण समारोह में नरेन्द्र मोदी ने सार्क प्रमुखों को मेहमान बना लिया. फिर लोगों ने मोदी के विदेशी दौरों की रफ़्तार देखी, विदेश नीति की नयी धार देखी, मन की बात देखी, नयी स्टाइल देखी, कुछ नये आइडिया भी देखे, लेकिन सब कुछ के बावजूद मोदी 2.1 से लोगों की वह उम्मीदें नहीं पूरी हुईं, जो उन्होंने लगायी थीं. अब कहा जा रहा है कि लोगों ने कुछ ज़्यादा ही उम्मीदें लगा ली थीं. यह सच नहीं है. ये सारी उम्मीदें लोगों ने लगायी नहीं थीं, बल्कि मोदी ने ख़ुद बोल-बोल कर जगायी थीं. आज ज़्यादातर देशी-विदेशी समीक्षक इसी बात पर हैरान हैं कि घरेलू मोर्चे पर मोदी की रफ़्तार अकसर क़दमताल जैसी क्यों रही?

पाँच 'टी' का टैलेंट कहाँ है?

तो मोदी 2.1 के पहले साल से सीख कर मोदी 2.2 में क्या अपडेट होने चाहिए? पहली बात यही कि ‘ब्रांड इंडिया’ बनाने के मोदी के मशहूर पाँच ‘टी’ सूत्रों में से एक टैलेंट भी था. लेकिन मोदी के अपने मंत्रिमंडल में ही कुछ गिने-चुने नामों को छोड़ कर इसकी भारी कमी दिखती है. टैलेंट की खोज तो मोदी को सबसे पहले यहीं करनी चाहिए. हालाँकि मनोहर परिक्कर औ सुरेश प्रभु को लाकर उन्होंने यह कमी पूरी करने की कोशिश तो की है, लेकिन जिस करिश्माई प्रदर्शन का वादा उन्होंने किया था, उसके लिए तो औसत से ऊपर का टैलेंट चाहिए, औसत से नीचे का नहीं! फिर मंत्रियों को काम करने की आज़ादी हो, यह भी ज़रूरी है. आर्थिक मोर्चे पर मोदी 2.2 को यह तय करना होगा कि उसे औद्योगिक विकास और लोक कल्याण में कैसे सन्तुलन साधना है? देश के आर्थिक इंजन को कैसा ईँधन चाहिए, क्या दिशा देनी है, इस बारे में मोदी 2.2 को कोई नया आइडिया ढूँढ कर निकालना ही होगा. ठीक वैसे ही जैसे 1991 में नरसिंहराव सरकार में वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था का गियर बदला था.

नयी औद्योगिक संस्कृति चाहिए

सब जानते हैं कि औद्योगिक विकास के बिना आज विकास का कोई ख़ाका बन नहीं सकता. औद्योगीकरण की रफ़्तार तेज़ हो, उद्योग और कारपोरेट जगत को फलने-फूलने का अच्छा माहौल मिले, इससे आज किसे इनकार हो सकता है. लेकिन यह जितना ज़रूरी है, उतना ही ज़रूरी यह भी है कि देश में एक नयी औद्योगिक संस्कृति गढ़ी जाये, जिसमें उद्योग भी विकसित हों और जनता के हितों का भी उतना ही ख़याल रखा जाये. विकास के नाम पर सारी मलाई उद्योग खायें और जनता ठगी जाती रहे, यह कौन-से विकास का माडल है? इसीलिए भूमि अधिग्रहण क़ानून और रियल एस्टेट रेगुलेटर बिल पर सरकार की मिट्टी पलीद हुई. किसानों की क़ीमत पर कारपोरेट और आम मध्यम वर्ग की क़ीमत पर बिल्डरों के हितों की चिन्ता सरकार को होने लगे, तो दो ही बातें हो सकती हैं. या तो यह विकास को लेकर सरकार का हड़बोंगपना है या फिर उसकी नीयत में कोई खोट है! इसी तरह शिक्षा और स्वास्थ्य भी दो बड़े महत्त्वपूर्ण लेकिन विकट क्षेत्र हैं. दोनों में सरकारी प्रयासों की बुरी गति है और निजीकरण के बाद दोनों को बेलगाम मुनाफ़ाख़ोरी की दीमक बुरी तरह चाट गयी है. फ़ीस महँगी और पढ़ाई बिलकुल क़ाग़ज़ी! अगर पढ़ाई काम लायक़ नहीं हुई तो रोज़गार न देश में मिलेगा और न विदेश में. यह समस्या भविष्य में बड़ी गम्भीर होनेवाली है. और विडम्बना यह कि शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों में ही मोदी 2.1 ने बजट में भारी कटौती की है. और शिक्षा में सुधार के नाम पर क्या हो रहा है? आधुनिक वैज्ञानिक चिन्तन को आगे बढ़ाने के बजाय उसे संघ की प्रयोगशाला में बदला जा रहा है! इसीलिए दीनानाथ बतरा आजकल मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी की तारीफ़ करते नहीं अघाते!

कृषि के लिए क्या योजना है

कृषि के लिए सरकार की क्या योजना है? फ़सल का मूल्य तय करने के बारे में चुनाव के पहले किसानों से जो वादा किया गया था, वह पूरा हो पायेगा या नहीं, हो सकता है या नहीं, इस पर बात साफ़ हो. देश की आधी से ज़्यादा आबादी अपने रोज़गार के लिए कृषि पर निर्भर है. मोदी 2.2 में कृषि के लिए स्पष्ट योजना होनी चाहिए. मोदी 2.2 का एक बड़ा एजेंडा यह भी होना चाहिए कि सरकार का कोई मंत्री, पार्टी का कोई नेता और संघ परिवार के कुछ सनकी तत्व कुछ अनाप-शनाप न बोलें. पिछले साल ऐसे बोलों ने मोदी की छवि बड़ी ख़राब की. और इन पर वह लम्बे समय तक चुप रहे, उससे लोग और हैरान हुए. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह कहते हैं कि पार्टी इन बयानों से सहमत नहीं है. फिर भी ऐसे बयान आते रहते हैं! कौन यह मानेगा कि पार्टी और परिवार में अमित शाह और नरेन्द्र मोदी जैसे क़द्दावर नेताओं की भी नहीं चलती? मोदी 2.2 ऐसा निरीह न दिखे, तो अच्छा है. या फिर मोदी 2.2 बेबाकी से स्पष्ट करे कि उसका एजेंडा क्या है विकास या हिन्दुत्व या फिर विकास के रैपर में हिन्दुत्व?

अपना 'बग' भी 'फ़िक्स' कीजिए!

और बोलने की बात आयी तो मोदी 2.2 को अपना ‘बग’ भी ‘फ़िक्स’ करना चाहिए. भूकम्प की जानकारी नेपाली प्रधानमंत्री को देने जैसे ट्वीट ने पहले कमाई गयी साख बट्टे में मिला दी! कभी लोग भारत में पैदा होना अभिशाप समझते थे, ऐसे बयान भी लोगों को अच्छे नहीं लगते, यह भी मोदी को अब तक पता चल ही गया होगा! फिर एक प्रधानमंत्री विदेश में जा कर विपक्ष की आलोचना करे, यह क़तई शोभा नहीं देता. जो राजनीति करना हो यहीं कीजिए, विदेश में सिर्फ़ कूटनीति कीजिए, राजनीति नहीं! मोदी 2.2 को समझना चाहिए कि नागरिक समूहों, सांविधानिक संस्थाओं, न्यायपालिका को वह जितनी स्वायत्तता देंगे, जितना खुला माहौल देंगे, उतना ही उनके लिए अच्छा है. ये लोकतंत्र के अनिवार्य उपकरण हैं और यह सत्ता को फिसलने से रोकते हैं. ऐसे दुराग्रहों से न देश का फ़ायदा होगा और न मोदी का कि किसी एनजीओ ने एक कारपोरेट घराने के किसी प्रोजेक्ट का ज़ोरदार विरोध कर दिया या कोई और विदेशी संगठन गुजरात के दंगापीड़ितों की आर्थिक मदद करता है, तो उस पर शिकंजा कस दो! यह सब बातें आज नहीं तो कल, लोगों को पता चल जाती हैं. ऐसी हरकतों से किसी सरकार की छवि नहीं बनती! ऐसे ही किसी डाक्यूमेंटरी पर रोक लगा देने जैसे बचकाने विवादों से सरकार का कोई भला नहीं होता.

आत्ममुग्धता का सिंड्रोम

और अन्त में हम उम्मीद करते हैं कि मोदी 2.2 अात्ममुग्धता के सिंड्रोम से भी मुक्त होगा. अब सारी दुनिया जानती है कि नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं, वह क्या कर रहे हैं, कैसे कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं और उसका क्या नतीजा हो रहा है, यह सारी दुनिया का मीडिया रात-दिन रिपोर्ट कर रहा है, सबको सब पता है. अगर आप कुछ अच्छा कर रहे हैं, तो वह दूसरों को ही बताने दीजिए. और वह बता ही रहे हैं, बताते ही रहेंगे क्योंकि सारी दुनिया की निगाहें आप पर लगी हैं यह देखने के लिए इतिहास ने आपको जो मौक़ा दिया है, उसका आप क्या करते हैं?

Leave a Reply

क़मर वहीद नक़वी

स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही.