‘ललितगेट’ से ख़ैर नरेन्द्र मोदी परेशान तो होंगे ही कि उनकी सरकार की छवि धूमिल हुई. लोग ताने मार रहे हैं. वह ‘मौन मोदी’ क्यों हो गये? भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ वह ख़ूब दहाड़ा करते थे. विदेश से कालेधन को वापस लाने की बड़ी-बड़ी बातें की थीं उन्होंने. उनका एक वरिष्ठ और ज़िम्मेदार मंत्री सबकी नज़रें बचा कर एक ऐसे आदमी की मदद क्यों कर रहा था, जिसे धन-धुलाई के लिए उनकी ही सरकार खोज रही हो? यह कैसे भ्रष्टाचार नहीं है? कैसे यह सरकार और देश के हितों के ख़िलाफ़ काम करना नहीं है? और ऐसे व्यक्ति को देश की सरकार में किस नैतिक आधार पर बने रहना चाहिए? किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री विदेश में हलफ़नामा देकर कहे कि मैं यहाँ जो कह और कर रही हूँ, उसका पता मेरे देश में किसी को नहीं लगना चाहिए, यह ग़लत नहीं है क्या?
सुना है लमो के बखेड़े से नमो बहुत परेशान हैं! सुनते हैं, अपने कुछ मंत्रियों से उन्होंने कहा कि लोग जो देखते हैं, उसी पर तो यक़ीन करते हैं! और यहाँ तो लोगों ने सिर्फ़ देखा ही नहीं, बल्कि लमो यानी ललित मोदी को सुना भी. यक़ीन न करते तो क्या करते? सच तो सामने है, बिना किसी खंडन-मंडन के! नमो इसीलिए परेशान हैं. खंडन-मंडन की गुंजाइश होती, जाँच का एलान कर बात टरकाने की गुंजाइश होती, तब क्या परेशानी थी भला! कर देते! लेकिन अबकी बार मामले की धार अलग है. जो हुआ, उसे झुठलाया ही नहीं जा सकता. कोई बहाना ही नहीं है, कन्नी काट सकने की कोई सम्भावना ही नहीं है! इसलिए रास्ता क्या है? यही कि ताल ठोक कर कहो कि हाँ किया तो किया, इसमें ग़लत क्या है?
लोग कहें 'ललितगेट', सुषमा पूछें ग़लत क्या?
और ग़लत हो भी कैसे हो सकता है? राष्ट्रवादी लोग जो ठहरे! जो वह करें, जो वह कहें, वही सही! किसी दूसरे ने यही किया होता तो अब तक ज़मीन-आसमान के कुलाबे एक हो गये होते! लेकिन ‘दूसरों’ और ‘अपनों’ में यही तो फ़र्क़ होता है! इसीलिए सवाल उठानेवालों से ही मुँहतोड़ पूछा जा रहा है कि इसमें क्या ग़लत है? बताइए क्या ग़लत है? वाक़ई लाख टके का सवाल है! एक आदमी को प्रवर्तन निदेशालय खोज रहा है. ब्लू कार्नर नोटिस जारी है उस पर. यानी वह क़ानून से बचता फिर रहा है. ऐसे आदमी की कोई मदद करना सही है या ग़लत? सही जवाब क्या है? जवाब सुषमा जी ने बता दिया. राष्ट्रवादी करे तो हमेशा सही, बाक़ी कोई करे तो बिलकुल देश-विरोधी काम होता! सवाल नम्बर दो. उस आदमी पर धन-धुलाई का आरोप है. नेता विपक्ष रहें तो सुषमा जी उसके ख़िलाफ़ लोकसभा में ज़ोरदार भाषण करें, कहें कि यूपीए सरकार सख़्त से सख़्त कार्रवाई करे, और विदेश मंत्री बन जायें, तो चुपके से उसी आदमी की मदद कर दें! बताइए क्या ग़लत है इसमें! जवाब है— विपक्ष से सत्ता में आने पर सदन में कुर्सी ही नहीं बदलती, राष्ट्रवाद की परिभाषा भी बदल जाती है! कथनी चाहे न बदले, करनी ज़रूर बदल जाती है! सवाल नम्बर तीन. मदद मानवीय आधार पर की गयी, तो क्या ग़लत है इसमें? मानवीय आधार पर मदद करना तो ग़लत नहीं, लेकिन ऐसे क्यों की गयी कि किसी को कानोंकान पता न चले? कोई ख़ुफ़िया आपरेशन था? देश की सुरक्षा से जुड़ा कोई मसला था? फिर देश को बता कर क्यों नहीं की गयी यह मानवीय मदद! सही काम था, तो पारदर्शी तरीक़े से होना चाहिए था? जो सवाल उठते, तभी उठते. देश में चर्चा होती, सरकार फ़ैसला कर लेती कि क्या करना है! बात ख़त्म! लेकिन विदेश मंत्री ने क्यों चुपके से मामला निपटा दिया? ‘ललितगेट’ को लेकर सवाल ही सवाल हैं. और ‘राष्ट्रवादियों’ का एक ही जवाब है, इसमें ग़लत क्या है?
वसुन्धरा जी, चुपके-चुपके, देश से छिप के क्यों?
अगर इसमें कुछ ग़लत नहीं, तो वसुन्धरा राजे ने भी कुछ ग़लत नहीं किया? है न! वह भी देश से छिपा कर ललित मोदी की मदद कर रही थीं. हलफ़नामा देकर कह रही थीं कि भारत में इसका पता किसी को न चले! और चुपके-चुपके लमो की कम्पनी से उनके बेटे दुष्यन्त की कम्पनी में करोड़ों रुपये भी आ गये, किसी को पता नहीं चला! और वह भी ऐसी कम्पनी से जिसका दफ़्तर ख़ाली प्लाट पर कहाँ पर है, किसी को पता नहीं! क्या मासूमियत है? पता नहीं लगे, पता नहीं चले, हम सही काम कर रहे हैं! समझ में नहीं आया. हमें तो यही समझ थी कि लोग हमेशा ग़लत काम छिप कर करते हैं! यहाँ मामला उलटा है. सही काम चोरी-छिपे हो रहा था! ग़लत काम होता तो शायद सबके सामने होता! इसीलिए पूछा जा रहा है कि इसमें ग़लत क्या है? पूरे विवाद में बस इसी एक सवाल का जवाब चाहिए. यह सब देश से छिपा कर क्यों किया जा रहा था? यह सही था या ग़लत? अगर संघ और बीजेपी की परिभाषा में यह सही है, तो उन्हें किसी राजनीतिक शुचिता की न बात करनी चाहिए और न दावा. और न ऐसे तर्क देकर बचने की कोशिश करनी चाहिए कि शरद पवार, सलमान ख़ुर्शीद, राजीव शुक्ल समेत दूसरी पार्टियों के नेता भी तो ललित मोदी से मिलते रहे. बेशक मिलते रहे. और शायद यह मानना भी ग़लत न हो कि उन्होंने भी गाहे-बगाहे लमो से मदद ली भी होगी और दी भी होगी. सबूत मिल जायें तो उनके ख़िलाफ़ भी ज़रूर कार्रवाई होनी चाहिए. बिलकुल करिए. सरकार आपकी है, जाँच कीजिए, धरिए-पकड़िए, लेकिन उनका नाम लेकर इन ‘अपनों’ को तो इन मामलों से तो नहीं बचाया जा सकता!
नरेन्द्र मोदी कुछ करेंगे या चुप रह जायेंगे?
नरेन्द्र मोदी ख़ैर परेशान तो होंगे ही कि उनकी सरकार की छवि धूमिल हुई. लोग ताने मार रहे हैं. नरेन्द्र मोदी अब बोलते क्यों नहीं? वह ‘मौन मोदी’ क्यों हो गये? भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ वह ख़ूब दहाड़ा करते थे. विदेश से कालेधन को वापस लाने की बड़ी-बड़ी बातें की थीं उन्होंने. उनका एक वरिष्ठ और ज़िम्मेदार मंत्री सबकी नज़रें बचा कर एक ऐसे आदमी की मदद क्यों कर रहा था, जिसे धन-धुलाई के लिए उनकी ही सरकार खोज रही हो? यह कैसे भ्रष्टाचार नहीं है? कैसे यह सरकार और देश के हितों के ख़िलाफ़ काम करना नहीं है? और ऐसे व्यक्ति को देश की सरकार में किस नैतिक आधार पर बने रहना चाहिए? किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री विदेश में हलफ़नामा देकर कहे कि मैं यहाँ जो कह और कर रही हूँ, उसका पता मेरे देश में किसी को नहीं लगना चाहिए, यह ग़लत नहीं है क्या? और अगर यह ग़लत नहीं है तो फिर कुछ भी ग़लत नहीं है! बात ख़त्म! बात ख़त्म शायद न हो. यह मुद्दा गले में हड्डी की तरह अटक सकता है. बिहार में कुछ महीनों बाद चुनाव है. और कुछ नहीं तो यह मामला भ्रष्टाचार पर बीजेपी का मुँह बाँध सकता है. दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में फुसफुसाहटें, अटकलें और अन्दाज़ों का गुणा-भाग चल रहा है. सुषमा स्वराज और वसुन्धरा राजे का क्या होगा? नरेन्द्र मोदी कैसी लकीर खींचेंगे! वसुन्धरा के उत्तराधिकारियों को लेकर तो चर्चा भी शुरू हो गयी. लेकिन सुषमा स्वराज का क्या होगा? जब उनका मामला पिछले रविवार को पहली बार उछला था, तभी कहनेवालों ने कहना शुरू कर दिया था कि नमो ने आख़िर सुषमा को भी निपटा दिया. लेकिन बीच में ऐसी कानाफ़ूसियाँ एकदम थम गयी थीं. अब फिर शुरू हो गयी हैं कि सुषमा के अब कितने दिन? बहरहाल, इन सवालों से अगले कुछ दिन बीजेपी और नरेन्द्र मोदी को जूझना है, लेकिन इन सवालों से भी बड़ा एक सवाल है. राजनीति की परतें एक के बाद एक उघड़ती जा रही हैं. एक-एक कर पोल खुलती जा रही है. पार्टी यह हो या वह हो, नेता यह हो वह हो, नाम छोटा हो या बड़ा हो, जब आइना सामने आता है, तो सब एक ही चाल, चरित्र और चेहरे वाले दिखने लगते हैं. फ़र्क बस नारों और नौटंकी का है! क्या इस नौटंकी का कोई अन्त है?
उप-राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ भी निशाना
यही नहीं, संघ के बड़े नेताओं ने उप-राष्ट्रपति हामिद अन्सारी की देशभक्ति पर दो बार अनर्गल सवाल उठाये, जिसके लिए बाद में उन्हें माफ़ी भी माँगनी पड़ी. और जब कुछ नहीं बचा तो इस पर आपत्ति उठाने की कोशिश की उप-राष्ट्रपति ने मुसलमानों के पिछड़ेपन के बारे में बयान क्यों दिया? अच्छा, यदि उप-राष्ट्रपति यह कहते कि दलित बहुत पिछड़े हैं और उनके विकास पर ध्यान दिया जाना चाहिए, तो भी क्या यह ग़लत होता? मुसलमानों की हालत दलितों से ज़रा ही बेहतर है. तो उप-राष्ट्रपति ने यह बात कह कर क्या ग़लत किया? और राष्ट्रपति के. आर. नारायणन पर तो किसी ने कभी उँगली नहीं उठायी कि उन्होंने दलितों के पिछड़ेपन की चर्चा क्यों की? दलित हो कर दलित पिछड़ेपन की बात करना ग़लत नहीं, लेकिन मुसलमान हो कर मुसलमानों के पिछड़ेपन की चर्चा करना पाप है?
चुप क्यों बैठी है मोदी सरकार?
और दिलचस्प बात देखिए कि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार इन मुद्दों पर कभी कुछ नहीं बोली. न कोई ट्वीट, न कोई बयान, न किसी मन की बात में इस सबकी कोई चर्चा! जैसे कहीं कुछ हुआ ही न हो! सरकार इन घटनाओं के समर्थन में चुप है या मजबूरी में? दोनों ही स्थितियाँ चिन्ताजनक हैं! यह हुई तीन कहानियों को मिला कर बनी कहानी, देश के रंगमंच पर जिसके खेले जाने की शुरुआत अब हो चुकी है. यह तब तक जारी रहेगी, जब तक मुसलमान ‘हिन्दू तरीक़े’ से रहना नहीं सीख जायेंगे!
Muslim Fundamentalism always helped RSS to built its case!
मुसलमान भी कम दोषी नहीं!
अब वह कहानी, जो इसके समानान्तर चलती है. मुसलिम पर्सनल लाॅ बोर्ड, जो मुसलिम समाज के लिए लाये जानेवाले हर प्रगतिशील और सुधारात्मक क़ानून का ज़बरदस्ती विरोध करता रहा, उलेमा जो अनाप-शनाप फ़तवे देकर मुसलमानों को हर आधुनिक विचार का विरोधी साबित करते रहे, और सोने पर सुहागा आज़म ख़ाँ, अबू आज़मी, असदुद्दीन ओवैसी, उनके पिता सलाहुद्दीन ओवैसी, इब्राहीम सुलेमान सैत, जी. एम. बनातवाला, इमाम बुख़ारी और सैयद शहाबुद्दीन जैसे मुसलमानों के स्वयंभू नेता, जो मुसलमानों को भड़काये और बरगलाये रखने की राजनीति करते रहे. और इस तरह रची गयी मुसलिम साम्प्रदायिकता से इनकी दुकानें तो चलती रहीं, लेकिन इसने हिन्दू साम्प्रदायिकता को मुसलमानों के ख़िलाफ़ वे तर्क मुहैया कराये, जिन्हें आम हिन्दू आसानी से सही मानने लगें! क्या मुसलमान अब भी आत्मनिरीक्षण करेंगे कि देश के आम हिन्दुओं में उनके ख़िलाफ़ जो माहौल बना है, उसके ज़्यादातर हथियार ख़ुद मुसलमानों के ही दिये हुए हैं?
Secular Politics or Vote Politics!
मुल्लाओं की पिछलग्गू सेकुलर राजनीति!
और अब इन कहानियों के बीच की कहानी, तथाकथित सेकुलर राजनीति की कहानी, जिसने मुसलमानों के विकास के लिए तो कुछ नहीं किया, उलटे शाहबानो से लेकर इमराना बलात्कार कांड और आरिफ़-गुड़िया-तौफ़ीक़ जैसे मामलों में मुल्लाओं के सामने घुटने टेकने से लेकर तमाम ऐसे काम किये जिससे मुसलमानों का केवल नुक़सान हुआ. मुसलिम तुष्टीकरण के नाम पर सेकुलरिज़्म बदनाम ज़रूर हुआ, लेकिन मुसलमानों को मिला किया? धेला भी नहीं! और अब हिन्दुत्व की बहती बयार को देख कर काँग्रेस और सपा जैसी पार्टियों को डर लगने लगा है कि मुसलमानों के बारे में कुछ ज़्यादा बोलेंगे तो कहीं हिन्दू वोट हाथ से न निकल जायें! सेकुलरों के लिए भी यह गहरे आत्मनिरीक्षण का समय है कि उन्होंने कभी यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड पर बहस तक चलाने की भी पहल क्यों नहीं की?
बहरहाल, यह मसला केवल मुसलमानों का नहीं है. हो सकता है कल को मुसलमान ‘हिन्दू तरीक़े’ से रहने को मजबूर हो जायें. लेकिन तब हिन्दुओं के लिए भी यह देश बहुत बदल चुका होगा! राज्य को धर्म के रथ में जोते जाने का नतीजा क्या होता है, दुनिया में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है! कलबुर्गी जैसे तमाम लोगों को निशाना बना कर भविष्य के हिन्दू राष्ट्र की तसवीर तो पेश की ही जाने लगी है!