तोते वही बोलें, जो संघ बुलवाये!

ख़तरा चालीस बरस पहले हुई 1975 की इमर्जेन्सी के फिर घटित होने का नहीं, बल्कि दूसरी ‘चुप्पी-घुप्पी इमर्जेन्सी’ का है, उस ‘उदार लोकतंत्र’ का है, जिसे मज़बूत बनाने में नरेन्द्र मोदी लगे हुए हैं. आडवाणी जी के इस निष्कर्ष में कोई अतिरंजना नहीं है कि लोकतंत्र को कुचलनेवाली ताक़तें आज देश में कहीं ज़्यादा ताक़तवर हैं और न ही इसे यह कह कर अनदेखा किया जा सकता है कि यह आडवाणी की बूढ़ी हताशा का विलाप है! ‘उदार लोकतंत्र’ के जो लक्षण आज चौतरफ़ा दिख रहे हैं, उनसे आसानी से अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि अगर यह ऐसे ही पाला-पोसा जाता रहा तो कुछ वर्षों बाद कैसे भयानक नतीजे सामने होंगे.

लोकतंत्र सुरक्षित है! आडवाणी जी की बातों में बिलकुल न आइए! उन्हें वहम है! इमर्जेन्सी जैसी चीज़ अब नहीं आ सकती! क्योंकि नरेन्द्र भाई ने देश को ट्वीट कर बताया है कि जीवन्त और उदार लोकतंत्र को मज़बूत बनाना कितना ज़रूरी है! इसीलिए ‘उदार लोकतंत्र’ में आडवाणी जैसों की कोई जगह नहीं, जिन्हें लगता हो कि लोकतंत्र को कुचलनेवाली ताक़तें आज पहले से कहीं ज़्यादा ताक़तवर हैं! सो बीजेपी ने जब इमर्जेन्सी की चालीसवीं बरसी मनायी, तो सारे ‘इमर्जेन्सी पीड़ितों’ का सम्मान किया, गुणगान किया, लेकिन आडवाणी को आने का न्योता तक नहीं दिया! वह इमर्जेन्सी में उन्नीस महीने जेल में रहे. लेकिन उनकी पार्टी जब इमर्जेन्सी को याद करती है तो उन्हें याद नहीं करती! ‘उदार लोकतंत्र’ की क्या शानदार मिसाल है! जो ‘नमोवत’ नहीं, जो दंडवत नहीं, जो करबद्ध नहीं, वह जात-बाहर!

Advani, Modi and 40th Anniversary of Emergency!

'उदार लोकतंत्र' और आडवाणी!

वैसे काफ़ी अरसा हो गया, आडवाणी जी को ‘मार्गदर्शक’ बने हुए. शायद उन्हें इसी ‘मार्गदर्शक’ शब्द से कोई ग़लतफ़हमी हो गयी कि पार्टी को वक़्त-ज़रूरत रास्ता दिखा देना उनकी ज़िम्मेदारी है! इसीलिए वह पार्टी को आगाह कर रहे थे कि जैसा माहौल है, वह लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण नहीं है और इमर्जेन्सी जैसी चीज़ का ख़तरा टला नहीं है. लेकिन ‘उदार लोकतंत्र’ में ‘मार्गदर्शक’ का काम रास्ता दिखाना नहीं होता, बल्कि रास्ते को चुपचाप निहारते रहना होता है, बस पार्टी के शो केस में ‘मैनेकिन’ बन कर सजे हुए! ‘मैनेकिन’ यानी वह पुतले जो कपड़े की दुकानों में सुन्दर-सुन्दर वस्त्र पहना कर खड़े कर दिये जाते हैं! आडवाणी ने ‘मैनेकिन धर्म’ का पालन नहीं किया! इसलिए ‘उदार लोकतंत्र’ का स्वाद उन्हें चखा दिया गया! लालकृष्ण आडवाणी ‘लोकतंत्र की रक्षा’ के लिए इमर्जेन्सी में जेल में रहे, लेकिन ख़ुद उन्हें भी पीछे मुड़ कर अपनी उन्मादी रथयात्राओं और बाबरी मसजिद के ध्वंस के दिनों की अपनी फ़ासिस्ट राजनीति की याद ज़रूर करनी चाहिए! 6 दिसम्बर 1992 को आडवाणी के नेतृत्व में अयोध्या में जो कुछ हुआ, वह लोकतंत्र और संविधान की बर्बर हत्या नहीं थी तो और क्या था? हालाँकि इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी संघ और बीजेपी को तब राजनीतिक कामयाबी नहीं हासिल हो सकी थी, क्योंकि देश ने अन्ततः लोकतंत्र को चुना और धार्मिक

 

चरमपंथ की राजनीति को नकार दिया. तब से अब तक बहुत कुछ बदल चुका है. आरएसएस यानी संघ ने भी और नरेन्द्र मोदी ने भी अपने-अपने इतिहास से बहुत कुछ सीखा है. इसलिए यह पक्का है कि वैसी इमर्जेन्सी अब नहीं आयेगी. क़ानूनन भी वैसा कर पाना अब आसान नहीं और वह इमर्जेन्सी संघ के ‘हिन्दू राष्ट्र’ के लक्ष्य के लिए भी किसी काम की नहीं!

अब नहीं आ सकती 1975 की इमर्जेन्सी!

इसलिए ख़तरा उस चालीस बरस पहले हुई 1975 की इमर्जेन्सी के फिर घटित होने का नहीं, बल्कि दूसरी ‘चुप्पी-घुप्पी इमर्जेन्सी’ का है, उस ‘उदार लोकतंत्र’ का है, जिसे मज़बूत बनाने में नरेन्द्र मोदी लगे हुए हैं. आडवाणी जी के इस निष्कर्ष में कोई अतिरंजना नहीं है कि लोकतंत्र को कुचलनेवाली ताक़तें आज देश में कहीं ज़्यादा ताक़तवर हैं और न ही इसे यह कह कर अनदेखा किया जा सकता है कि यह आडवाणी की बूढ़ी हताशा का विलाप है! ‘उदार लोकतंत्र’ के जो लक्षण आज चौतरफ़ा दिख रहे हैं, उनसे आसानी से अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि अगर यह ऐसे ही पाला-पोसा जाता रहा तो कुछ वर्षों बाद कैसे भयानक नतीजे सामने होंगे. फ़िलहाल दिल्ली में केजरीवाल सरकार ‘उदार लोकतंत्र’ का मज़ा चख रही है. ‘सारधा’ की लपटों से घिर कर ममता बनर्जी ‘नमोवत’ हो चुकी हैं, इसलिए वहाँ अब सब ठीक है. लेकिन बिहार की जनता को सन्देश साफ़ है! केन्द्र वाली पार्टी चुनना अच्छा रहता है! जो माँगोगे केन्द्र से, मिल जायेगा, वरना दूसरी पार्टी रही तो खटराग चलता रहेगा! यह ‘उदार लोकतंत्र’ है!

मालेगाँव बदलो, इतिहास भी बदलो!

और अभी-अभी ख़बर आयी है कि मालेगाँव मामले की सरकारी वकील रोहिणी सालियान पर दबाव डाला गया कि हिन्दू आरोपियों के विरुद्ध वह मामले को ज़रा ‘नरम’ कर दें. वह नहीं मानीं तो उन्हें आनन-फ़ानन में हटा दिया गया! सरकारी वकील को ‘नरमाने’ की कोशिश क्यों की जा रही थी. और वह नहीं मानीं, तो उन्हें एक झटके में हटा क्यों दिया गया? सवाल का जवाब इतना कठिन है क्या? गुजरात की फ़र्ज़ी मुठभेड़ों के मामलों की अब क्या स्थिति है, यह सबके सामने है! सरकार अब इतिहास बदलने में भी जुटी है. इतिहास अब वह होगा, जो संघ चाहता है. इतिहास में कुछ ग़लत है, तो ज़रूर उसे सही कीजिए. लेकिन सही करने का तरीक़ा क्या है? हर विचारधारा के इतिहासकारों की कमेटी बनाइए. सारे ऐतिहासिक साक्ष्य उसमें पेश हों. देश में उस पर बहस हो और जो तथ्य सही साबित हो, उसे शामिल कर लीजिए, जो ग़लत हो, उसे हटा दीजिए. लेकिन किसी एक ‘मत विशेष’ को बिना जाँचे-परखे आप ‘असली’ इतिहास बना दें, यह लोकतंत्र की किस परिभाषा में आता है? हो सकता है कि काँग्रेस के इतने लम्बे राज में इतिहास में हेरा-फेरी हुई हो! अगर आपकी बात सही है, तो ईमानदारी दिखाने से क्यों डरते हैं? दुनिया में कहीं भी इतिहास आस्थाओं से नहीं, प्रमाणों से बनता और चलता है. आप भी ले आइए ऐतिहासिक प्रमाण, तर्क कीजिए, तर्क सुनिए और मनवा लीजिए अपनी बात, बदल दीजिए इतिहास! कौन मना करता है?

योग, रक्षाबन्धन और न्यायपालिका!

अभी योग दिवस हुआ. अच्छा है. होना चाहिए. भारतीय गौरव की बात है. लेकिन उप-राष्ट्रपति हामिद अन्सारी को लेकर संघ के एक बड़े और बहुत अनुभवी नेता ने जो बखेड़ा खड़ा किया, वह कोई ग़लती से नहीं हो गया था. उप-राष्ट्रपति को पिछली 26 जनवरी को भी संघ परिवार की ओर से लाँछित करने की कुचेष्टा की गयी थी! यह वही आरएसएस है, जिसने बरसों तक अपने मुख्यालय पर राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराया था. उपराष्ट्रपति जैसे व्यक्ति की निष्ठा को लेकर लगातार बेहूदा और बेबुनियाद शंकाएँ खड़ी की जायें, यह अनायास नहीं हो सकता! फिर योग को देशभक्ति से जोड़ने का क्या अर्थ है? कुछ मुसलिम संगठनों का योग को धर्म का नाम लेकर ख़ारिज करना भी ग़लत है तो संघवादियों का यह आग्रह भी ग़लत है कि योग नहीं करना भारतीय गौरव की उपेक्षा करना है! योग करना, न करना लोगों का निजी चुनाव है, इसे ‘भारतीय होने की अनिवार्य शर्त’ के तौर पर कैसे स्थापित किया जा सकता है? क्रिसमस के दिन आप ‘गुड गवर्नेन्स डे’ मनायें और अब सुनते हैं कि रक्षा बन्धन को बड़े पैमाने पर मनाये जाने की तैयारी है. क्योंकि पिछले साल संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कह दिया था कि हिन्दू संस्कृति की रक्षा के लिए ऐसा किया जाना चाहिए. तो आपके ‘उदार लोकतंत्र’ का लक्ष्य और अर्थ क्या है, यह समझना मुश्किल नहीं है. न्यायपालिका की स्वायत्तता ख़त्म करने पर सरकार अड़ी हुई है. जजों की नियुक्ति यह कह कर अपने हाथ में लेना चाहती है कि कालेजियम सिस्टम में नियुक्तियाँ सही नहीं हुई. जिस सरकार को फ़िल्म संस्थान के लिए मेरिट के आधार पर नियुक्ति करना ज़रूरी न लगे, वह जजों की नियुक्ति को लेकर क्या करेगी, समझा जा सकता है! और किसी सरकार को ‘मनमर्ज़ी’ के जजों की ज़रूरत क्यों हो? आइआइएम जैसी संस्थाओं पर सरकार आख़िर क्यों क़ब्ज़ा करना चाहती है? ये तो बड़े-बड़े मुद्दे हैं. पिछले दिनों राष्ट्रीय संग्रहालय के निदेशक को अचानक हटा दिया गया. चर्चा है कि उन्होंने प्रधानमंत्री के एक कार्यक्रम के लिए भगवान बुद्ध की दुर्लभतम अस्थियों को संग्रहालय से बाहर ले जाने का अनुरोध ठुकरा दिया था. उन्हें नियम पालन करने का पुरस्कार थमा दिया गया! नागरिक समूह और स्वयंसेवी संगठन सरकार के किसी क़दम का कोई विरोध न कर पायें, इसका इन्तज़ाम करने में सरकार लगी ही है. यानी सब जगह केवल वही लोग हों, जो सरकार की कठपुतलियाँ हों और हाँ में हाँ मिलाते रहें. यही ‘उदार लोकतंत्र’ है? और यह तथाकथित ‘उदार लोकतंत्र’ इमर्जेन्सी से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है! क्योंकि इसका लक्ष्य केवल अपनी निर्बाध सत्ता बनाये रखना नहीं, बल्कि देश को एक वैचारिक पिंजड़े में क़ैद करके रखना है, जिसके ऊपर मुलम्मा लोकतंत्र का हो, लेकिन तोते वही बोलें, जो संघ बुलवाये!

और दिलचस्प बात देखिए कि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार इन मुद्दों पर कभी कुछ नहीं बोली. न कोई ट्वीट, न कोई बयान, न किसी मन की बात में इस सबकी कोई चर्चा! जैसे कहीं कुछ हुआ ही न हो! सरकार इन घटनाओं के समर्थन में चुप है या मजबूरी में? दोनों ही स्थितियाँ चिन्ताजनक हैं! यह हुई तीन कहानियों को मिला कर बनी कहानी, देश के रंगमंच पर जिसके खेले जाने की शुरुआत अब हो चुकी है. यह तब तक जारी रहेगी, जब तक मुसलमान ‘हिन्दू तरीक़े’ से रहना नहीं सीख जायेंगे!

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क़मर वहीद नक़वी

स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही.