उलटे चाँद के देश में!

क्या आज से तीस-चालीस साल पहले भी कोई चाँद को देखता और उसे लगता कि आज चाँद उलटा निकला है? क्या सौ साल पहले, दो सौ साल पहले, चार सौ साल पहले या हज़ार-दो हज़ार साल पहले भी कभी किसी को लग सकता था कि चाँद आज उलटा निकल आया है? लाखों साल पहले जब आदमी ने धरती पर क़दम रखा था, जब अक्षर भी उसके पास नहीं थे, तब से लेकर अभी तीस-चालीस साल पहले तक ऐसा क्यों नहीं हुआ कि किसी को लगा हो कि आज चाँद उलटा निकला है क्या? तो आज आख़िर ऐसा क्या हो गया कि बहुत-से लोगों को चाँद उलटा दिख गया! क्यों हुआ ऐसा? क्या है इसका मतलब? बात मामूली नहीं, बहुत गहरी है! इतनी गहरी कि यह आपको तय करना है कि आगे आनेवाली पीढ़ियों को आप क्या देकर जाना चाहते हैं?

जिस देश में चाँद उलटा निकल सकता है, हम उस देश के वासी हैं! बात अफ़वाह की नहीं है, जो अभी आये भूकम्प के बाद फैली और तेज़ी से फैली, लेकिन उतनी ही तेज़ी से ख़ारिज भी हो गयी. बात अफ़वाह के बहुत आगे की है! और बात मामूली नहीं, बहुत गहरी है. इतनी गहरी कि यह आपको तय करना है कि आगे आनेवाली पीढ़ियों को आप क्या देकर जाना चाहते हैं? बहुत-से लोगों को चाँद उलटा दिख गया, उससे भी कहीं ज़्यादा लोगों ने यह सुन-पढ़-जान कर तुरन्त मान भी लिया कि चाँद उलटा निकल आया है! क्या मतलब है इसका और क्यों यह मतलब बड़ा गहरा है?

इधर मंगलयान, उधर उलटा चाँद!

अब ज़रा सोचिए. क्या आज से तीस-चालीस साल पहले भी कोई चाँद को देखता और उसे लगता कि आज चाँद उलटा निकला है? और फिर वह किसी और को यह बात बताता तो वह भी मान लेता? और फिर अफ़वाह फैल जाती और बहुत-से लोगों को लगने लगता कि चाँद सचमुच उलटा निकल आया है? और क्या सौ साल पहले, दो सौ साल पहले, चार सौ साल पहले या हज़ार-दो हज़ार साल पहले भी कभी किसी को लग सकता था कि चाँद आज उलटा निकल आया है? जिस दौर में लोग मानते थे कि पृथ्वी थाली की तरह चिपटी है, उस दौर में भी किसी को कभी चाँद उलटा नहीं दिखा, तो आज जब देश मंगलयान पर तालियाँ पीट रहा है, सूचना क्रान्ति की सुनामी है, मोबाइल, इंटरनेट, फ़ेसबुक, ट्विटर,व्हाट्सएप, गूगल और न जाने क्या-क्या ऐसा हरदम हाथ में है, जिस पर संसार की हर सूचना चुटकियाँ बजाते उपलब्ध है, बड़े-बड़े महँगे नामी-गिरामी लक़दक़ स्कूल हैं, हाई-फ़ाई पढ़ाई है, डिग्रियों पर डिग्रियाँ हैं, तब ऐसा क्यों हो गया कि चाँद उलटा दिख गया? लाखों साल पहले जब आदमी ने धरती पर क़दम रखा था, जब अक्षर भी उसके पास नहीं थे, तब से लेकर अभी तीस-चालीस साल पहले तक ऐसा क्यों नहीं हुआ कि किसी को लगा हो कि आज चाँद उलटा निकला है क्या?

दुनिया फैल गयी, अनुभव सिकुड़ गये!

तो आज ऐसा क्यों हो रहा है? पिछले तीस-चालीस बरसों में ऐसा क्या बदल गया कि चाँद उलटा दिखने लगे? पढ़ तो बहुत लिया, लेकिन देखा क्या? दरअसल, देखना और देख कर जानना बन्द हो गया है. यही समस्या है. आदमी की दुनिया बहुत बड़ी हो गयी है, अनुभव का दायरा लगातार छोटा हो रहा है! अब अगर शहरों में रातों को इतनी रोशनी रहती है कि चाँदनी के होने या न होने का पता ही न चले तो किसकी नज़र चाँद पर जायेगी और कैसे पता चलेगा कि चाँद की कलाएँ कैसे घटती-बढ़ती और बदलती हैं? देख कर और कर के सीखने के अवसर ही ख़त्म होते जा रहे हैं. जीवन के तमाम छोटे-छोटे अनुभव अब बच्चों को सीधे नहीं मिलते. जो मिलता है, वह किताबों से मिलता है. इस बात ने एक बहुत बड़ा फ़र्क़ डाला है. जो अनुभव आप सीधे करते हैं, उसे तमाम तरह से परख कर देखते हैं, तमाम तरह की जिज्ञासाएँ होती हैं, ऐसे क्या होता है, वैसे क्या होता है, ऐसा क्यों होता है, वैसा क्यों नहीं होता, ऐसा करने से क्या होता है, वैसा करने से क्या होता है? तो ऐसे सवालों को परखते-जाँचते जो महसूस किया, पूरी तरह से महसूस किया. और उसके बाद कोई अगर कहे कि आपने जो महसूस किया, वह वैसा नहीं होता बल्कि दूसरी तरह से होता है तो आप तब तक मानते नहीं, जब तक ख़ुद उसे फिर कर के देख न लें! लेकिन जब बच्चे के सब कुछ सीखने की शुरुआत स्कूल और किताबों से ही हो, तीन साल की उम्र से उसके निजी अनुभवों की दुनिया बस यहीं सिमट जाये, तो बच्चा जो सीखेगा, किताबों से ही सीखेगा और वही उसका अन्तिम सत्य बन जायेगा! उस पर उसके दिमाग़ में सवाल उठेंगे ही नहीं, क्योंकि उन सवालों को सीधे जाँचने का उसके पास कोई साधन ही नहीं! किताब से सीखने और अनुभव कर के सीखने में यही फ़र्क़ है. बच्चा यह जानता है कि किताब में पाठ के नीचे जो चार-पाँच सवाल होते हैं, उनके जवाब रट कर परीक्षा पास की जाती है, बस! लेकिन अनुभव से जो सवाल उपजते हैं, उनके जवाब जब तक मिलते नहीं, मन कुलबुलाता रहता है. और जब जवाब मिल जाते हैं, तो वह कभी भूले नहीं जा सकते क्योंकि वह रट कर नहीं, ढूँढ कर पाये गये हैं!

सबसे बड़ा सवाल कि सवाल क्यों नहीं उठते?

अनुभव से नहीं सीखेंगे, तो सवाल नहीं उठेंगे! इसीलिए ऐसा हुआ कि सोशल मीडिया पर लोग इस बात पर विश्वास करते चले गये कि चाँद उलटा निकला है. इतने सारे पढ़े-लिखे लोगों के मन में यह छोटा-सा सवाल क्यों नहीं उठा कि क्या कभी ऐसा सम्भव है? और अगर किसी दिन ऐसा हुआ तो क्या हमारा सौरमंडल सेकेंडों में तबाह नहीं हो जायेगा? क्या हम फ़ेसबुक पर स्टेटस अपडेट करने के लिए बचे रहेंगे? आज के युग में जब विज्ञान घर-घर में है, पढ़ने-लिखने, बोलने-बतियाने, कपड़े धोने से लेकर खाना बनाने तक और टीवी देखने से लेकर मच्छर मारने तक घर का कोई काम विज्ञान और तकनालाजी के बिना सम्भव नहीं है, जब मेडिकल साइन्स के चमत्कार रोज़ सामने आ रहे हों, ऐसे में लोगों के मन में अगर यह मामूली-सा सवाल भी न उठे कि चाँद भला उलटा कैसे निकल सकता है, तो यह आज के समाज का सबसे बड़ा सवाल है! ऐसे छोटे-छोटे और स्वाभाविक सवालों का न उठना बड़ा सवाल क्यों है? वह कहावत है न कि आदमी अनुभवों से सीखता है. अनुभव सिर्फ़ सिखाता और ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि आदमी को उसके आसपास के संसार से, चीज़ों से, आदमियों से जोड़ कर भी रखता है! फिर वहीं से सवाल उठते हैं और वहीं से उत्तर भी मिलते हैं. अनुभव की जड़ों के ज़रिए ही जीवन-रस मन तक पहुँचता है और अगर यह मानवीय अनुभव न हो तो आदमी भी जड़ हो जाता है और समाज भी! इसीलिए केवल किताबी ज्ञान कुछ नहीं सिखाता, जड़ बना देता है. वर्चुअल क्लासेज़, इंटरनेट यह सब ज्ञान बाँटेंगे, लेकिन अनुभव नहीं दे पाते हैं और अनुभव करना भी नहीं सिखा पाते हैं. इसीलिए हम सवाल करने की प्रवृत्ति खोते जा रहे हैं और जो जानकारी हमें मिलती है, उस पर सहज विश्वास करने लगे हैं.

रोबोट सवाल नहीं करते, कुछ समझे आप?

रोबोट और कम्प्यूटर सवाल नहीं करते. वह उतना ही कर सकते हैं और वही काम कर सकते हैं, जिसके लिए वह बनाये गये हैं और जितनी जानकारी उनकी मेमोरी में ठूँसी गयी है. उस जानकारी के सिवा वह कुछ नहीं जानते, उस जानकारी पर वह कोई सवाल नहीं खड़ा कर सकते. क्यों? इसलिए कि उनका अपना कोई अनुभव नहीं होता! इसलिए हम अगर जीवन के अनुभवों से कटते जायेंगे, तो एक दिन मानवीय रोबोट के अलावा कुछ नहीं रह जायेंगे! सोशल मीडिया पर इस बात को देख कर मैं अब तक बहुत हैरान होता था कि लोग हर जानकारी पर बिना सोचे-समझे विश्वास कैसे कर लेते हैं, तुरन्त उस पर ‘रिएक्ट’ कैसे कर देते हैं, तुरन्त किसी घटना या व्यक्ति के बारे में राय क्यों बना लेते हैं, वह एक पल के लिए क्यों नहीं सोचते कि जो लिखा गया है, वह ग़लत भी हो सकता है. इसीलिए दंगों में आजकल सोशल मीडिया का भयानक इस्तेमाल होने लगा है. जो ‘फ़ीड’ कर दिया गया, उस पर चल पड़े रोबोट की तरह! इसलिए अगर आप अपने समाज को रोबोट नहीं बनाना चाहते तो अपने बच्चों को अनुभव की दुनिया में ले जाइए!

Leave a Reply

क़मर वहीद नक़वी

स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही.