भाषण बस भाषण के लिए!

वैसे, मोदी के इस भाषण से लोग बड़े ख़ुश हैं! होना भी चाहिए! भाषण तो बिलकुल सही था, इसमें सन्देह नहीं! एक सज्जन तो इतने ख़ुश हुए कि लिखा कि अगर महात्मा गाँधी आज जीवित होते तो मोदी पर ज़रूर गर्व करते! किसी और ने लिखा कि सब समस्या ख़त्म और देश अब विकास और सुशासन के रास्ते पर बेरोकटोक बढ़ेगा. किसी को लगता है कि समय आ गया है कि बीजेपी को अब संघ से बिलकुल नाता तोड़ कर अपनी नयी राह बनानी चाहिए! एक भाषण और इतनी अपेक्षाएँ, इतनी व्याख्याएँ, इतनी सम्भावनाएँ!

बहुत देर में बोले, लेकिन आख़िर नमो बोले! धर्म के नाम पर किसी को घृणा नहीं फैलाने दी जायेगी. कहते हैं, देर आयद, दुरुस्त आयद! मोदी बोले, बड़े लम्बे इन्तज़ार के बाद बोले, लेकिन बिलकुल दुरुस्त बोले! देश ने बड़ी राहत की साँस ली! उम्मीद की जा रही है कि परिवार अब शायद कुछ दिन चुप बैठे! घृणा ब्रिगेड अपनी बैरकों में लौट कर आराम फ़रमाये! ‘घर वापसी’, ‘लव जिहाद’, चार बच्चे, दस बच्चे, रामज़ादे या हरामज़ादे जैसी ज़हरबुझी नौटंकियाँ अब शायद बन्द हो जायेंगी!

इतने दिनों क्यों सोचते रहे मोदी?

हाँ, इतना तो शायद हो जाये! लेकिन इसके पहले सवाल यह कि आख़िर नमो इतने दिनों तक चुप क्यों बैठे रहे? वह तो तुरन्त फ़ैसले लेते हैं न! चुटकियों में, मिनटों में! फिर वह इतने दिनों तक क्यों सोचते रहे कि बोलें कि न बोलें? हाँ, क़रीब दो महीने पहले ख़बर आयी थी कि मोदी ने संघ को कह दिया है कि वह घृणा ब्रिगेड पर अंकुश लगाये. हो सकता है कि ख़बर सही ही रही हो! क्योंकि कुछ अंकुश लगा भी. लेकिन कुछ दिन बाद फिर वही खटराग शुरू हो गया! तो इस बार क्या होगा? कितने दिन ‘घर वापसी’ नहीं होगी? वैसे लोग मोदी के इस भाषण से बड़े ख़ुश हैं! होना भी चाहिए! भाषण तो बिलकुल सही था, इसमें सन्देह नहीं! एक सज्जन तो इतने ख़ुश हुए कि लिखा कि अगर महात्मा गाँधी आज जीवित होते तो मोदी पर ज़रूर गर्व करते! किसी और ने लिखा कि सब समस्या ख़त्म और देश अब विकास और सुशासन के रास्ते पर बेरोकटोक बढ़ेगा. किसी को लगता है कि समय आ गया है कि बीजेपी को अब संघ से बिलकुल नाता तोड़ कर अपनी नयी राह बनानी चाहिए! एक भाषण और इतनी अपेक्षाएँ, इतनी व्याख्याएँ, इतनी सम्भावनाएँ!

बात सिर्फ़ मुसलमानों, ईसाइयों की नहीं!

सवाल यह है कि इसमें देश के लिए क्या सन्देश है? और क्या देश की समस्या महज़ इतनी है कि परिवार अब भड़काऊ बातें न करे और लोग शान्ति से रहें! जी नहीं. सवाल यह नहीं है. सवाल इससे कहीं ज़्यादा विराट है. सवाल यह है कि देश किस रास्ते पर चले? देश क्या बने? हम आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक आधुनिकता का रास्ता पकड़ें, वैज्ञानिक-तार्किक चिन्तन को चुनें या मिथकों और किंवदन्तियों का विज्ञान गढ़ें और अतीत की तथाकथित स्वर्णिम सांस्कृतिक कन्दराओं में बन्द रहें ताकि आधुनिकता का ‘वायु-प्रदूषण’ हमें संक्रमित न करे? संघ और संघ परिवार केवल मुसलमानों और ईसाइयों के ख़िलाफ़ प्रचार में ही लगे होते तो शायद मोदी का यह भाषण काफ़ी होता, बशर्ते कि मोदी इस भाषण पर अमल भी करने का इरादा रखते होते! लेकिन बात सिर्फ़ मुसलमानों, ईसाइयों की नहीं. बात सिर्फ़ धार्मिक आधार पर भेदभाव करने, नफ़रत फैलाने और लोगों को बाँटने की नहीं है. संघ का एजेंडा तो कहीं बड़ा है. देश, समाज, विज्ञान, इतिहास, संस्कृति और इतिहास पर संघ की दृष्टि तमाम आधुनिक अवधारणाओं के बिलकुल उलट वैदिक क़ालीन पुरातनपंथी है. और सरकार पर जिस तरह संघ का वर्चस्व है या कि यह कहें कि सरकार की नकेल तो पूरी तरह संघ के हाथ में है, इसलिए यह सवाल सबसे पहला और सबसे बड़ा है कि हम कैसा देश बनाना चाहते हैं? और लोगों ने कैसा देश बनाने के लिए नरेन्द्र मोदी को वोट दिया था?

विज्ञान, इतिहास वही जो संघ कहे!

संघ की संस्कृति की कल्पना क्या है? जन्मदिन पर केक न काटें! एक जनवरी को नया साल न मनायें! लड़कियाँ जीन्स न पहनें? बल्कि कोई पश्चिमी परिधान न पहनें! अंग्रेज़ी पढ़ने से भारतीय संस्कृति नष्ट होती है! और विज्ञान की कल्पना क्या है? अभी हाल में हुई विज्ञान काँग्रेस में बताया गया कि एक समय भारत में कैसे-कैसे विमान बनते थे! विज्ञान बिना प्रमाणों के चलता नहीं है, लेकिन संघ के विज्ञान को प्रमाणों की ज़रूरत नहीं. उसका विज्ञान भी उसकी आस्थाओं पर चलता है. उसका इतिहास भी उसकी आस्थाओं पर चलता है. उसे किसी ऐतिहासिक, पुरातात्विक साक्ष्य की ज़रूरत नहीं, वह वेद-पुराण-उपनिषदों के ज़रिये इतिहास लिखने की तैयारी में है और यही देश का नया ‘प्रामाणिक’ इतिहास होगा! शिक्षा की संघ की कल्पना का अन्दाज़ा दीनानाथ बतरा की किताबों से बख़ूबी चलता है. संघ की यह परिकल्पना यहाँ से शुरू हो कर अन्तत: वैदिक युगीन हिन्दू राष्ट्र तक पहुँचती है. और जब इतिहास या विज्ञान के लिए किसी प्रमाण की ज़रूरत न हो, तो आप कुछ भी लिख सकते हैं. मसलन, आजकल फैलाया जा रहा है कि ऊँच-नीच जाति व्यवस्था तो हिन्दुओं में कभी थी ही नहीं. यह तो मुग़लों की देन है! मुग़लों ने दलित बना दिये! वाह भई वाह! यह नयी खोज अभी हाल में ही हुई है क्योंकि संघ को लगता है कि दलित वोट अगर टूट कर बीजेपी के पास आ गये तो वह अजेय हो जायेगी. इसीलिए दलितों की बदहाली मुग़लों के नाम मढ़ दो, ताकि दलित-मुसलिम वोट बैंक में दरार पड़ जाये. न सबूत, न गवाह, रच गया नया इतिहास! इसी तरह आजकल संघ बाबासाहेब आम्बेडकर पर भी नया इतिहास लिख रहा है कि मुसलमानों के बारे में आम्बेडकर की राय अच्छी नहीं थी. वजह वही कि दलित-मुसलिम वोट में फूट पड़ जाये! तो संघ कैसा इतिहास लिखेगा, इसका अन्दाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है!

संविधान का राष्ट्र, संघ का राष्ट्र!

नरेन्द्र मोदी को वोट विकास और सुशासन के नाम पर मिला था. लोगों को उन्होंने इक्कीसवीं सदी के भारत का एक मनोहारी सपना बेचा था. आर्थिक तौर पर सम्पन्न, राजनीतिक तौर पर सबल और सामाजिक तौर पर एक आधुनिक प्रगतिशील राष्ट्र का सपना! क्या संघ की अवधारणाएँ इस सपने के बिलकुल उलट नहीं हैं? असली ख़तरा यही है. संविधान में राष्ट्र की जो परिकल्पना है, संघ की परिकल्पना उसके बिलकुल उलट है. सरकार संविधान से चलती है, जो घोषित तौर पर सेकुलर है. संघ की अपनी परिकल्पना हिन्दू राष्ट्र की है. इसलिए तात्कालिक तौर पर संघ और उसका परिवार ‘भड़काऊ तीरों’ को भले ही तरकश में ढक कर रखे रहे, लेकिन संघ का लक्ष्य तो वही रहेगा, जो है! और अगर संघ से राई-रत्ती तक पूछे बिना बीजेपी जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने का फ़ैसला अकेले अपने दम पर नहीं कर सकती तो यह कैसे मान लिया जाये कि मोदी सरकार संघ से कभी अपना पगहा तुड़ा कर दौड़ सकती है?

अब तक क्या किया मोदी ने?

इसलिए मोदी के भाषण के निहितार्थ बहुत ही सीमित और तात्कालिक हैं, सिर्फ़ हल्ला-ग़ुल्ला बन्द करने भर के लिए! वरना मोदी ने कौन-से ऐसे क़दम उठाये जिससे पता चले कि वह इस सबके ख़िलाफ़ हैं? क्या लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण नहीं कराया गया था? क्या अमित शाह से लेकर तमाम बीजेपी नेता उसमें शामिल नहीं थे? ख़ुद मोदी ने माँस निर्यात का सवाल ज़ोर-शोर से उठाया था! आज सच्चाई यह है कि उनकी सरकार के नौ महीनों में माँस निर्यात में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी हुई है! उत्तर प्रदेश में पिछले उपचुनाव में योगी आदित्यनाथ को बीजेपी का प्रभारी किसने बनाया था? उन्होंने ‘लव जिहाद’ का मुद्दा कितने ज़ोर-शोर से उठाया था? और प्रदेश बीजेपी उसे अपने प्रस्ताव का हिस्सा बनाते-बनाते बस अन्तिम क्षणों में ठिठक गयी थी! अभी हाल में दिल्ली चुनाव में अचानक मौलाना बुख़ारी के ज़रिये साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की नाकाम कोशिश किसने की थी? क्रिसमस को ‘गुड गवर्नेन्स डे’ के तौर पर मनाने का फ़ैसला किसने किया था? शिक्षा, इतिहास, कला और संस्कृति से जुड़ी तमाम संस्थाओं का काम लगातार संघ के लोगों के हवाले कौन कर रहा है? ज़ाहिर है कि सरकार में ऊपर से लेकर नीचे तक संघ का एजेंडा चल रहा है. आगे भी चलेगा. बस फ़र्क़ यही है कि अब शोर मचाये बग़ैर चलेगा. आपको याद होगा कि प्रधानमंत्री ने पन्द्रह अगस्त के अपने पहले भाषण में कहा था कि दस साल तक लोग जातिवाद, क्षेत्रवाद और साम्प्रदायिकता पर रोक लगा कर आगे बढ़ें. अभी बिहार में महादलित वोटों के लिए बीजेपी ने क्या गुल खिलाया, किससे छिपा है! मतलब? भाषण बस भाषण के लिए! उसे वही समझिए!

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क़मर वहीद नक़वी

स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही.