इससे बड़ा मज़ाक़ क्या होगा? यहाँ दिल्ली में एक नहीं, दो नहीं, तीन-तीन सरकारें चलती हैं! एक प्रधानमंत्री की, एक मुख्यमंत्री की और एक नजीब जंग की! लेकिन अस्पतालों के कान कौन पकड़े? चार मासूम मौतें हो गयीं. दो बच्चों की, और एक मासूम बच्चे के ग़मज़दा माँ-बाप ने आत्महत्या कर ली. अस्पतालों का क्या बिगड़ा? क्या कार्रवाई हुई? कौन पकड़ा गया? शर्म कहीं होती तो शर्म से चुल्लू भर पानी में डूब मरती! लेकिन दिल्ली में कुछ नहीं हुआ. न अस्पतालों को, न सरकारों को!
शर्म कहीं मिलती है? दिल्ली में कहीं मिलती है? अपने देश में कहीं मिलती है? यहाँ तो कहीं नहीं मिलती! किसी को उसकी ज़रूरत ही नहीं है! यह देश की राजधानी का आलम है. जहाँ बड़ी-बड़ी सरकारें हैं. वहाँ अस्पतालों की ऐसी बेशर्मी, ऐसी बेहयाई है कि शर्म कहीं होती तो शर्म से चुल्लू भर पानी में डूब मरती! लेकिन दिल्ली में कुछ नहीं हुआ. न अस्पतालों को, न सरकारों को! सब वैसे ही चल रहा है, जैसे कुछ हुआ ही न हो!
Why Govt. Can't bring Strong Law to Stop Inhuman Treatment by Hospitals?
मर गया तो क्या हुआ?
हाँ, हुआ क्या? यही न कि शहर के कई अस्पतालों ने डेंगू से बीमार एक ग़रीब बच्चे का इलाज करने से इनकार कर दिया और बच्चे की मौत हो गयी. क्योंकि अस्पतालों को ‘मोटा पैसा’ नहीं मिल पाता उससे! यह क्या बड़ी बात है? दिल्ली के निजी और सरकारी अस्पतालों में तो आये दिन ऐसे क़िस्से होते ही रहते हैं! ग़म में बच्चे के माता-पिता ने आत्महत्या कर ली! क्या बड़ी बात है? लोग तो आत्महत्याएँ करते ही रहते हैं! किसान बीस सालों से आत्महत्याएँ करते ही आ रहे हैं. देश में किसे फ़िक्र हुई? तो अगर एक मासूम बच्चे के ग़मज़दा माँ-बाप ने आत्महत्या कर ली, क्या बड़ी बात हो गयी? सरकारें क्या करें? उन्होंने अस्पतालों को नोटिस दे दी! ख़ानापूरी हो गयी! काम ख़त्म! अस्पताल क्यों डरते? एक हफ़्ते बाद देश की राजधानी में एक और ग़रीब बच्चा इसी तरह मर गया, क्योंकि ‘पैसाख़ोर’ अस्पतालों ने उसे अपने दरवाज़ों से लौटा दिया!
Establish Medical Regulatory Authority to set Standards and effectively check Inhuman Treatment by Hospitals
चल रही है 'मिनिमम गवर्नमेंट'!
इससे बड़ा मज़ाक़ क्या होगा? यहाँ दिल्ली में एक नहीं, दो नहीं, तीन-तीन सरकारें चलती हैं! एक प्रधानमंत्री की, एक मुख्यमंत्री की और एक नजीब जंग की! मेरा पावर-तेरा पावर की काटम-कूट वीर सरकारें! लेकिन अस्पतालों के कान कौन पकड़े? चार मासूम मौतें हो गयीं. दो बच्चों की, उनके माता-पिता की. अस्पतालों का क्या बिगड़ा? क्या कार्रवाई हुई? कौन पकड़ा गया? केजरीवाल क्या करें? पहले तो नजीब जंग उन्हें कुछ करने दें! जंग साहब तो मानते ही नहीं कि दिल्ली में कोई चुनी हुई सरकार भी है. उनकी अपनी अलग सरकार है, जो केन्द्र के हुक्म पर चलती है. आज भी अफ़सरों से वह यही कह रहे हैं! और हाँ, इन अस्पतालों में कोई ‘आप’ वाला भी नहीं निकला, इसलिए जंग साहब की ‘यस सर तत्पर’ जंगी पुलिस ने भी कोई जंग नहीं छेड़ी! वरना अब तक तो मंगल ग्रह तक सबको पता चल गया होता कि दिल्ली पुलिस क्या चीज़ है? ‘मिनिमम गवर्नमेंट’ क्या होती है, दिल्ली वाले देख रहे हैं और अस्पताल वाले उसका आनन्द लूट रहे हैं! ‘ईज़ आॅफ़ डूइंग बिज़नेस’ का ज़माना है! प्राइवेट अस्पताल वालों के लिए बिज़नेस का ‘पीक टाइम’ है डेंगू. उन्हें बिज़नेस करने दीजिए. डिस्टर्ब मत कीजिए! वरना ‘इकाॅनाॅमिक ग्रोथ’ कैसे होगी?
Unholy nexus of Private Hospitals, Doctors, Path Labs and Pharma Companies: Patient is 'Target' for them!
वैसे ‘मिनिमम गवर्नमेंट’ कोई नरेन्द्र मोदी का अपना आविष्कार नहीं है. हम तो आज़ादी के बाद से अब तक ‘मिनिमम गवर्नमेंट’ ही देख-देख कर उम्र गुज़ार गये हैं! इसलिए सरकार होती तो सब जगह हैं, केन्द्र में, राज्यों में,लेकिन वह इतनी ‘मिनिमम’ होती है कि हो कर भी किसी को नहीं दिखती!
नौ साल से रुका एक क़ानून!
अब अस्पतालों को ही ले लीजिए. अस्पताल सरकारी हों या निजी. आये दिन ऐसी ख़बरें आती रहती हैं कि अस्पतालों ने मरीज़ को लेने से मना कर दिया और अस्पतालों के चक्कर काटते-काटते उसकी मौत हो गयी! क्यों हम आज तक ऐसा कोई क़ानून नहीं बना पाये कि कोई अस्पताल किसी मरीज़ को ‘इमरजेन्सी’ की हालत में लौटा नहीं सकता. उसके पास उस बीमारी के इलाज की सुविधा न भी हो, तो भी कम से कम फ़ौरी मेडिकल देखरेख दे कर उसे दूसरे अस्पताल तक पहुँचाने की ज़िम्मेदारी अस्पताल की ही होनी चाहिए. और अगर ड्यूटी पर मौजूद लोग अगर ऐसा नहीं करते तो क्यों नहीं उन्हें जेल की सज़ा होनी चाहिए? क्या दिक़्क़त है ऐसा क़ानून बनाने में? शायद बहुत कम लोगों को याद होगा कि नौ साल पहले विधि आयोग (Law Commission of India) ऐसे एक क़ानून (Emergency Medical Care to victims of Accidents and during Emergency Medical Condition and Women Under Labour, August 2006) का मसौदा सरकार को दे चुका है. वह मसौदा तब से सरकारी आलमारियों में कहाँ दबा-दबाया पड़ा होगा, किसे पता? तब से जाने कितने ग़रीब इस तरह अस्पतालों के चक्कर काटते-काटते मरे होंगे! चलिए, मान लिया कि वह यूपीए की निकम्मी सरकार थी, अब आप तो उस पर काम शुरू कीजिए. हालाँकि इस सरकार का ही रिकार्ड कौन-सा बेहतर है. अपने वरिष्ठ मंत्री की सड़क दुर्घटना में मौत के बाद कहा गया था कि सरकार एक महीने में बहुत कड़ा मोटर वाहन क़ानून (Motor Vehicle Act) लायेगी. पन्द्रह महीने तो हो गये हैं. अभी क़ानून का मसौदा ही नहीं तैयार हो सका है!
हर मरीज़ 'टारगेट' है!
यह एक पहलू है, दूसरी बड़ी समस्या है प्राइवेट अस्पतालों में चल रही खुली लूट और बेईमानी, उसका इलाज क्यों नहीं ढूँढा जा सकता? सबको मालूम है कि प्राइवेट अस्पतालों ने डाक्टरों के ‘टारगेट’ तय कर रखे हैं, कितने रुपये के पैथालाॅजिकल टेस्ट उन्हें हर महीने लिखने हैं, महीने में कितने लोगों को आॅपरेशन के लिए ‘रिफ़र’ करना है, कौन-सी महँगी दवाइयाँ लिखनी हैं! हर मरीज़ उनके लिए ‘टारगेट’ है! और महँगी दवाइयों का तो पूरा का पूरा रैकेट है. एक ही दवा के अलग-अलग ब्राँड की क़ीमत दो रुपये से लेकर तीस रुपये तक हो सकती है. अब यह डाॅक्टरों पर निर्भर है कि वह आपको दो रुपये वाली दवा लिखें या पन्द्रह रुपये वाली या तीस रुपये वाली. सस्ती से सस्ती और महँगी से महँगी दवाओं के मामले में यह रैकेट जारी है. कैंसर की दवा 35 हज़ार रुपये की भी आ सकती है और वही दवा कोई और कम्पनी किसी और ‘ब्राँड नेम’ से डेढ़ लाख रुपये की भी बेचती है. दिल के मरीज़ों को लगनेवाले ‘स्टेंट’ का भी यही रैकेट है, क्वालिटी वही लेकिन दामों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़! हालत यह है कि आप किसी अस्पताल में जाइए, बड़ा हो, छोटा हो, नामी-गिरामी हो, आप आश्वस्त हो ही नहीं सकते कि अस्पताल ने आपसे जो ख़र्चे कराये थे, वह ज़रूरी थे या ग़ैर-ज़रूरी, जो टेस्ट लिखे, जो दवाएँ लिखीं, वह ज़रूरी थीं या नहीं! ऐसी-ऐसी भयानक शिकायतें अस्पतालों के बारे में रोज़ मिलती रहती हैं कि रूह काँप जाये. इसी तरह पैथालाॅजी लैब की अन्धाधुन्ध लूट चल रही है. कौन से टेस्ट का कितना पैसा उन्हें लेना चाहिए, कुछ हिसाब नहीं!
क्यों नहीं बनाते मेडिकल नियामक प्राधिकरण?
सबको पता है कि फ़ार्मा कम्पनियों, पैथ लैब और डाक्टरों-अस्पतालों का गँठजोड़ किस तरह मरीज़ों को निचोड़ रहा है, लेकिन आज तक किसी सरकार ने कुछ सोचा ही नहीं कि इस पर क़ाबू कैसे पाया जाया. जान से ज़्यादा क़ीमती चीज़ किसी के लिए क्या हो सकती है? फिर भी किसी सरकार को आज तक इसकी कोई चिन्ता क्यों नहीं हुई! ठीक है कि निजी अस्पताल हैं, मुनाफ़ा भी उन्हें कमाना है, किसी को इस पर एतराज़ नहीं है. लेकिन उनके लिए कुछ क़ायदे-क़ानून तो हों, उनके कामकाज के नियमित आॅडिट का कोई तंत्र तो हो, यह कोई कठिन काम नहीं है. मेडिकल नियामक प्राधिकरण (Medical Regulatory Authority) बन सकता है, जो देश भर में मेडिकल चिकित्सा की गुणवत्ता और क़ीमत दोनों की निगरानी कर सकता है. क्या सरकार हुज़ूर से यह छोटा-सा क़दम उठेगा?