इंटरनेट धीरे-धीरे युवाओं की अकेली ऐसी खिड़की बनता जा रहा है, जिसके ज़रिए वह दुनिया को, समाज को, अपने आसपास को देखते, जानते, समझते, पहचानते और जाँचते-परखते हैं. उनका पूरा जीवन वर्चुअल स्पेस में सिमट कर रह गया है. शहरों में जैसे ही बच्चे होश सम्भालते हैं, नाना-नानी, दादा-दादी, माँ-बाप के हाथों से उनकी उँगलियाँ छूटती जाती हैं और की-बोर्ड और माउस के ज़रिए वे एक आभासी संसार में प्रवेश करते हैं, जो उनकी मानसिक बनावट को शिफ़्ट, कंट्रोल, आल्ट, डिलीट, इंटर के मसाले से गढ़ता है! सब आनलाइन है. होमवर्क, चुटकुले, गेमिंग, दोस्त, सब आनलाइन! और जो आफ़लाइन है, वह है ही नहीं! या होता ही नहीं!
इंटरनेटजीवियों के बारे में यह ख़बर बिलकुल भी अच्छी नहीं है! इंटरनेट कम्पनियाँ ज़रूर इससे ख़ुश हो लें, लेकिन मुझे तो इसने थोड़ा डरा दिया है. वैसे, यह बात तो सभी जानते हैं कि इंटरनेट के बिना अब न दुनिया चल सकती है और न लोगों की ज़िन्दगी! लेकिन इस ‘अन्तर्जाल’ के ‘इन्द्रजाल’ में लोगों के प्राण इस तरह अटक चुके हैं, ऐसा शायद किसी ने सोचा भी न हो!
बिसाहड़ा की इंटरनेट के लिए सब छोड़ देंगे!
अभी इंटरनेटजीवी दुनिया पर एक सर्वे आया है. भारतीय कम्पनी ‘टाटा कम्युनिकेशन्स’ ने दुनिया के छह देशों अमेरिका, ब्रिटेन, फ्राँस, जर्मनी, सिंगापुर और भारत में यह अध्य्यन किया. सर्वे की सबसे बड़ी बात यह है कि लोगों ने कहा कि इंटरनेट कनेक्शन न हो तो उन्हें लगता है कि वह दुनिया से बिलकुल कट गये हैं, अलग-थलग पड़ गये हैं, पीछे छूट गये हैं, ग़ुस्सा आने लगता है, चिन्ता बढ़ जाती है, खोया-खोया-सा लगता है. हैरानी की बात यह है कि ऐसा महसूस करनेवालों में भारतीय सबसे आगे हैं. 82 प्रतिशत भारतीय ऐसा ही मानते हैं, जबकि जर्मनी मे ऐसा माननेवालों की संख्या सबसे कम यानी 45 प्रतिशत है. और ऐसा इसलिए है कि भारत में लोग दिन भर में सबसे ज़्यादा यानी हर दिन औसतन छह घंटे से भी ज़्यादा समय इंटरनेट पर बिताते हैं! और भारतीयों का हाल यह है कि वह बिना इंटरनेट के सात घंटे से ज़्यादा रह ही नहीं सकते. इससे भी चौंकानेवाली बात यह है कि लोगों ने कहा कि वे इंटरनेट के लिए शराब, टीवी, चॉकलेट, खेलकूद और यहाँ तक कि अन्तरंग सम्बन्ध को भी छोड़ देंगे!
आधा दिन इंटरनेट पर!
यानी इंटरनेट इस्तेमाल करने वाला हर भारतीय औसतन अपना एक चौथाई दिन इंटरनेट पर बिताता है. इसका मतलब यह हुआ कि ज़्यादातर भारतीय युवा औसतन क़रीब-क़रीब नौ से बारह घंटे हर दिन इंटरनेट पर बिताते हैं! क्योंकि 35 पार की उम्र के बाद लोगों का आनलाइन रहने का समय घटता जाता है. जो जितना बुज़ुर्ग, वह उतना कम आनलाइन! यही चिन्ता की बात है. इंटरनेट धीरे-धीरे युवाओं की अकेली ऐसी खिड़की बनता जा रहा है, जिसके ज़रिए वह दुनिया को, समाज को, अपने आसपास को देखते, जानते, समझते, पहचानते और जाँचते-परखते हैं. उनका पूरा जीवन वर्चुअल स्पेस में सिमट कर रह गया है. शहरों में जैसे ही बच्चे होश सम्भालते हैं, नाना-नानी, दादा-दादी, माँ-बाप के हाथों से उनकी उँगलियाँ छूटती जाती हैं और की-बोर्ड और माउस के ज़रिए वे एक आभासी संसार में प्रवेश करते हैं, जो उनकी मानसिक बनावट को शिफ़्ट, कंट्रोल, आल्ट, डिलीट, इंटर के मसाले से गढ़ता है! सब आनलाइन है. होमवर्क, चुटकुले, गेमिंग, दोस्त, सब आनलाइन! और जो आफ़लाइन है, वह है ही नहीं! या होता ही नहीं!
अब कुछ बरदाश्त नहीं!
इसीलिए उनकी वर्चुअल दुनिया तो बहुत बड़ी है, लेकिन असली दुनिया बहुत छोटी, लगभग उन कमरों जितनी, जिसमें उनका परिवार रहता है. मुहल्ले बचे नहीं हैं, अपने आसपास के समाज से उनका वास्तविक सम्पर्क कट चुका है. पिछले कुछ समय से मैं इस बात पर बड़ा हैरान था कि युवा अब पहले से ज़्यादा उग्र और कठोर क्यों होते जा रहे हैं? वे किसी को भी ‘स्पेस’ देने को क्यों तैयार नहीं? लिफ़्ट में, सड़क पर, शापिंग माल में या सोशल नेटवर्किंग साइटों पर या कहीं भी, युवाओं को हम ऐसे क्यों पाते हैं, किसी की परवाह किये बिना लिफ़्ट में पहले कैसे घुस जायें, इसका भी इन्तज़ार न करें कि जो लिफ़्ट के अन्दर है, पहले उसे बाहर आने का रास्ता दे दें, कहीं से भी गुज़र रहे हों, तो किसी को भी धकियाते हुए अपना रास्ता बना लें, फ़ेसबुक-ट्विटर पर किसी पर कुछ भी कमेंट कर देना, तुरन्त फ़ैसला सुना देना, जो बात पसन्द है, वह सही है बाक़ी सब बकवास है, जो भी इतिहास है, उसे क्या जानना-समझना, क्यों टाइम ख़राब करना, हमें तो बस अपने कल से लेना-देना है, वग़ैरह-वग़ैरह. पहले लगता था कि ऐसा इसलिए कि आजकल जीत का फ़ैशन है. जीते तो हीरो और हारे तो ज़ीरो! इसलिए जीतो और चाहे जैसे जीतो, बच्चों को शायद यही घुट्टी पिलायी जाती है! इसलिए बच्चे आजकल कुछ बर्दाश्त नहीं करते. हमारे बचपन में मुहल्ले का कोई भी आदमी किसी बच्चे को कुछ बदमाशी, बदतमीज़ी करता पाता, तो बिना झिझक डाँट सकता था, न माने तो एक-दो हाथ जड़ भी सकता था, लेकिन आज तो पड़ोसी का बच्चा कुछ गड़बड़ करे तो कन्नी काट कर निकल जाने में ही भलाई है, जैसे कुछ देखा ही न हो! तो यह तो एक कारण है क्योंकि अब बच्चों को सिखाया ही यह जाता है कि वह कुछ सहन न करें. क्योंकि माना जाता है कि सहन कर लेने से वह दब्बू हो जायेंगे और फिर इस प्रतिस्पर्धी समाज में पिछड़ते चले जायेंगे!
सामाजिक कंडीशनिंग!
और ऐसे में जब असली दुनिया के असली लोगों की असली ज़िन्दगियों के बजाय उनका लगभग पूरा समय वर्चुअल दुनिया में बीतने लगे, तो फिर मामला और ख़तरनाक हो जाता है. ख़ास तौर पर भारत जैसे देश में, जहाँ इतने धर्मों, सम्प्रदायों, क्षेत्रीयताओं, जातियों के लोग रहते हैं. जब इन विविध पहचान वाले लोगों से वास्तविक जीवन में आपकी सीधी जान-पहचान नहीं होगी, किसी के परिवार में आना-जाना नहीं होगा, तो उनके बारे में जो भी धारणा बनेगी, वह बाहरी स्रोतों से बनेगी! और वह बाहरी स्रोत कौन हैं? सोशल नेटवर्किंग साइट पर आनेवाली टिप्पणियाँ और सही-ग़लत सूचनाएँ! इसलिए इसमें आश्चर्य क्या कि देश में साम्प्रदायिक सौहार्द की स्थिति लगातार ख़राब होती जा रही है. सोशल नेटवर्किंग साइटों की बदौलत साम्प्रदायिक हिंसा की कई घटनाएँ हो चुकी हैं. और केवल साम्प्रदायिक हिंसा क्यों, नस्ली हिंसा की वारदातें भी लगातार बढ़ रही हैं. अभी हाल में ही दिल्ली में तीन अफ़्रीकी मूल के युवकों की पिटाई इसका ताज़ा उदाहरण है. उत्तर-पूर्व के लोग हमारे शहरों में अकसर ऐसी हिंसा और सामाजिक उत्पीड़न के शिकार होते ही रहे हैं. ऐसा इसलिए कि हमारी सामाजिक कंडीशनिंग ही ऐसी हो गयी है. और यह कंडीशनिंग तभी ध्वस्त हो सकती है जब लोगों में व्यक्तिगत सम्पर्क बढ़े, लोग आपस में मिले-जुलें, खाये-पियें, शादी-ब्याह, तीज-त्योहारों में शामिल हों. तब ही उनके बारे में सही समझ बन सकेगी कि वे भी ठीक-ठीक आप जैसे ही हैं, आप जैसा ही सोचते हैं और आप जैसे ही रहते-सहते हैं. अभी मुझे फ़ेसबुक पर एक सज्जन मिले जो समझते थे कि भारत में हर मुसलिम महिला बुर्क़ा पहनती है. जब उन्हें बताया गया कि मुसलमानों में जो लड़कियाँ पढ़-लिख गयी हैं, उनमें से ज़्यादातर लड़कियाँ अब काम करती हैं, नौकरियों में हैं और बुर्क़े पहनती ही नहीं, तो उनकी धारणा बदली!