किसकी जेब के आठ लाख करोड़?

सरकारी बैंकों के क़र्ज़ों का महाघोटाला कोई एक-दो लाख करोड़ का मामला नहीं है. क़रीब साढ़े आठ लाख करोड़ रुपये के क़र्ज़े ऐसे हैं, जिनकी वसूली की सम्भावना अब न के बराबर समझी जा रही है! यानी भारत की कुल जीडीपी का क़रीब 6.7 प्रतिशत हिस्सा चट किया जा चुका है या जिसके वापस मिलने की अब लगभग उम्मीद नहीं है! और इनमें से 87 फ़ीसदी हिस्सा अमीर कॉरपोरेट समूहों को दिये क़र्ज़ों का है.

न हंगामा है, न ग़ुस्सा. न चिन्ता है, न क्षोभ. ‘ग्रेट इंडियन बैंक डकैती’ हो गयी तो हो गयी. लाखों करोड़ रुपये लुट गये, तो लुट गये. ख़बर आयी और चली गयी. न धरना, न प्रदर्शन, न नारे, न आन्दोलन. न फ़ेसबुकिया रणबाँकुरे मैदान में उतरे. न किसी ने पूछा कि क़र्ज़ों का यह महाघोटाला करनेवाले कौन हैं? फ़र्ज़ी वीडियो टेप के झूठे भाषण के सहारे कन्हैया कुमार को ‘देशद्रोही’ घोषित कर देनेवाली सरकार ने अभी तक रस्मी तौर पर भी नहीं कहा कि वह इस महाघोटाले के दोषियों का पता लगाने के लिए कोई जाँच करेगी, या उन लोगों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई होगी, जो लाखों करोड़ की यह रक़म डकार गये. कोई एक-दो लाख करोड़ नहीं, बल्कि क़रीब साढ़े आठ लाख करोड़ रुपये के क़र्ज़े ऐसे हैं, जिनकी वसूली की सम्भावना अब न के बराबर समझी जा रही है! यानी भारत की कुल जीडीपी का क़रीब 6.7 प्रतिशत हिस्सा चट किया जा चुका है या जिसके वापस मिलने की अब लगभग उम्मीद नहीं है!

Bad Bank Loans : Deafening Silence on Great Indian Bank Loot

इतना सन्नाटा क्यों है भाई!

‘शोले’ का डायलॉग याद है आपको—इतना सन्नाटा क्यों है भाई? वाक़ई इतने भयानक आँकड़ों के बाद भी ऐसी उदासीनता क्यों? जवाब बड़ा आसान है और सबको मालूम भी है. क्योंकि सारा का सारा मामला देश के शीर्षस्थ अमीरों से जुड़ा है, जो बड़े आराम से क़र्ज़ गड़प गये और ऐश कर रहे हैं! कुछ आँकड़ों को देखिए. हिल जायेंगे! सरकारी बैंकों के कुल डूबे क़र्ज़ों का 87 प्रतिशत हिस्सा ऐसे क़र्ज़ का है, जो पाँच करोड़ रुपये से ऊपर के हैं. ज़ाहिर है कि यह कॉरपोरेट क़र्ज़ है. किसान और छोटे-मँझोले कारोबारी इतना बड़ा क़र्ज़ ले ही नहीं सकते. रिज़र्व बैंक के ताज़ा अनुमानों के मुताबिक़ सरकारी बैंकों के कुल एनपीए (नॉन परफ़ार्मिंग एसेट या आम भाषा में कहें तो डूब गयी रक़म) का एक-तिहाई हिस्सा सिर्फ़ 30 बक़ायेदारों के ज़िम्मे है. सिर्फ़ तीस!

जानबूझ कर नहीं चुकाते क़र्ज़!

‘राग देश’ के एक पाठक अम्बुज गुप्त कई महीनों से कह रहे थे कि मुझे बैंक क़र्ज़ों के घालमेल पर लिखना चाहिए. फिर पिछले हफ़्ते भी उन्होंने याद दिलाया. और जब इस पर खोजबीन करने बैठा तो कई चौंकानेवाली बातें सामने आयी, जिनमें एक बेहद चौंकानेवाली बात तो यही है कि क़र्ज़ों का भुगतान न करनेवाले लोगों में ऐसे लोगों की भी बड़ी संख्या है, जो जानबूझकर क़र्ज़े नहीं चुका रहे हैं! यानी उन्हें मालूम है और पक्का इत्मीनान है कि उनके ख़िलाफ़ कुछ भी नहीं किया जायेगा!

Why no one want to name and shame borrowers of bad bank loans?

क़ौन हैं बक़ायेदार, जो सब गड़प गये?

कौन हैं ये बक़ायेदार? कोई इनका नाम बताने को तैयार नहीं है. तर्क दिया जा रहा है कि ऐसा करना बैंक और ग्राहक की गोपनीयता को भंग करना होगा, जो क़ानूनी तौर पर जायज़ नहीं है. वाह जनाब वाह! मान गये हुज़ूर! लेकिन एक सवाल पूछने की ग़ुस्ताख़ी कर रहा हूँ. यह तर्क 2011 में कहाँ था, जब कुछ बैंक ‘शर्म करो’ अभियान के तहत अपने उन बक़ायेदारों के नाम और फ़ोटो अख़बारों में विज्ञापन देकर और सड़कों पर होर्डिंग लगा कर छाप रहे थे, जो महज़ कुछ हज़ार या कुछ लाख का क़र्ज़ नहीं चुका पाये थे! यही नहीं, उन्हें धमकी यह भी दी गयी कि अगर अब भी उन्होंने क़र्ज़ नहीं चुकाया तो उनकी गारंटी लेनेवाले लोगों के नाम और फ़ोटो छाप कर उन्हें भी ‘लज्जित’ किया जायेगा!

तो चार साल पहले ग़रीब और आम आदमी की इज़्ज़त से खुलेआम और मनमाना खिलवाड़ करनेवाले बैंक और सरकार आज ‘ग्राहक की गोपनीयता’ की दुहाई क्यों दे रहे हैं? इसीलिए न कि मामला बड़े-बड़े अमीरों की इज़्ज़त का है!

Bad Bank Loans: Credit Suisse 'House of Debt 2015

क्रेडिट सूइज़ की रिपोर्ट

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि क़र्ज़ गड़प कर बैठे लोगों के नाम लोगों को पता नहीं हैं. कारपोरेट कारोबार और शेयर बाज़ार पर पैनी नज़र रखनेवाली (Credit Suisse)’क्रेडिट सूइज़ सिक्योरिटीज़ रिसर्च ऐंड एनालिटिक्स’ की अक्तूबर 2015 की ‘हाउस ऑफ़ डेब्ट’ (House of Debt 2015) रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में पिछले तीन सालों में क़र्ज़ के बोझ से सबसे ज़्यादा दबे दस कारपोरेट समूहों में लैन्को, जेपी समूह, जीएमआर, वीडियोकॉन, जीवीके, एस्सार, अडानी, रिलायन्स अनिल धीरूभाई अम्बानी समूह, जेएसडब्लू और वेदान्ता शामिल हैं. देश में समूचे कॉरपोरेट क़र्ज़ का 27 फ़ीसदी हिस्सा इन दस कॉरपोरेट समूहों के ही नाम है. एक और चौंकानेवाला तथ्य यह है कि पिछले आठ सालों में इनके ऊपर क़र्ज़ सात गुना बढ़ गया! मतलब? साफ़ है कि इन आठ सालों में इन्हें लगातार और धड़ाधड़ क़र्ज़ मंज़ूर किये गये.

क्रेडिट सूइज़ का यह भी कहना है कि इस क़र्ज़ के बड़े हिस्से को बैंकों ने अभी तक ‘स्ट्रेस्ड एडवान्सेज़’ यानी ‘संकट में पड़ा क़र्ज़’ (ऐसा क़र्ज़ जिसके डूब सकने का संकट दिखने लगे) घोषित नहीं किया है, जबकि यह क़र्ज़े लगभग ख़तरे के निशान को छू रहे हैं. मतलब यह कि इनकी गिनती उस ‘डूब चुके क़र्ज़’ या ‘डूब सकने की सम्भावना वाले क़र्ज़’ में नहीं है, जिनकी चर्चा हम ऊपर कर चुके हैं, जबकि जेपी, लैन्को, एस्सार और जीएमआर के क़र्ज़ को तो रेटिंग एजेन्सियाँ लगभग डूबा हुआ मान ही चुकी हैं. कुल मिला कर इन दस बड़े समूहों पर कुल 7 लाख 33 हज़ार करोड़ के क़र्ज़ में से कम से कम 20 से लेकर 90 प्रतिशत क़र्ज़ डूबने के कगार पर आ चुका है, (लिंक में दिया ग्राफ़िक्स देखिए). सब मिला कर देश में बैंकों के कुल क़र्ज़ का 17 फ़ीसदी हिस्सा ऐसा है, जिसके लौटने के आसार या तो नहीं हैं या बेहद कम हैं.

अमीर क़र्ज़, ग़रीब क़र्ज़ का फ़र्क़!

अगर अमीर क़र्ज़दारों के नाम बताने में इतना संकोच है, तो उनसे क़र्ज़ वसूलने के लिए बैंक क्या करते होंगे, यह आसानी से समझा जा सकता है. वैसे ग़रीबों से बैंक कैसे क़र्ज़ वसूलते हैं, यह आसपास कुछ लोगों से पूछ कर देखिए. किसानों की दयनीय हालत और उनकी लगातार बढ़ती आत्महत्याओं के बावजूद दस-दस हज़ार रुपये के बक़ाये वसूलने के लिए बैंक कैसे अमानवीय तरीक़े अपनाते हैं, यह किसे पता नहीं? लेकिन अब न बैंक बोल रहे हैं, न सरकार बोल रही है कि इन अमीर क़र्ज़दारों से बक़ाया वसूलने के लिए कुछ किया भी जायेगा या नहीं. सरकार एक ‘बैड बैंक’ बनाने की सोच रही है, जिसके ज़िम्मे सारा डूबा हुआ क़र्ज़ दे दिया जाये और जो उसे वसूलने की कोशिश करता रहे. वसूल पाये या न वसूल पाये, यह अलग बात है. बहरहाल, अब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद स्थिति शायद कुछ बदले.

Why 90% Bad Bank Loans belongs to Public Sector Banks?

सवाल यह है कि बैंकों ने यह क़र्ज़ क्या देख कर दिया, जो डूब गया? और सरकारी बैंकों का ही क़र्ज़ इस तरह क्यों डूबता है? एक रिपोर्ट के मुताबिक़ दिसम्बर 2015 की तिमाही के अन्त में 25 सरकारी बैंकों का एनपीए 3 लाख 96 हज़ार करोड़ रुपये था, जबकि 14 निजी बैंकों का कुल एनपीए महज़ क़रीब साढ़े 41 हज़ार करोड़ रुपये था. यानी सारे बैंकों के कुल एनपीए का 90 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा सरकारी बैंकों (Government Owned Banks) के ही मत्थे है. यानी कहीं न कहीं सरकारी बैंकों की क़र्ज़ मंज़ूर करने की प्रक्रिया में भारी गड़बड़ तो है. मान लिया कि सरकारी बैंकों पर सावर्जनिक क्षेत्र के उपक्रमों को क़र्ज़ देने का दबाव भी रहता है और इनमें से कई सार्वजनिक उपक्रम गवर्नेन्स और लाभ कमाने के मामले में खोटे हैं. ऐसे क़र्ज़ों को छोड़ भी दें, तब भी डूबे क़र्ज़ों का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा है, जो सवालों के घेरे में है कि यह क़र्ज़े किस आधार पर दिये गये?

बरसों से गड़बड़ी, किसी को दिखी क्यों नहीं?

सरकारी बैंकों के बोर्ड में एक रिज़र्व बैंक का डायरेक्टर होता है और एक सरकार का प्रतिनिधि. फिर ऑडिटर होते हैं. इतने बरसों से बैंकों में चल रही गड़बड़ किसी ने पकड़ी क्यों नहीं? इस बन्दरबाँट की जाँच कराने की कोई बात नहीं कर रहा है. बस सरकार यह कह रही है कि आगे से गड़बड़ न हो, इसे रोकने के लिए एक बैंक बोर्ड ब्यूरो बनाया जायेगा, जिसमें उद्योग जगत के नामी-गिरामी और विश्वसनीय चेहरे होंगे, जो बैंक बोर्डों में डायरेक्टरों की नियुक्ति करेंगे. सरकारी बैंकों के प्रबन्धन को ‘प्रोफ़ेशनल’ बनाने के लिए सरकार उनमें अपनी हिस्सेदारी घटा कर 51 फ़ीसदी करेगी. यह सब तो ठीक है, लेकिन जो लूट हो गयी, उसका क्या, उस पर सब चुप हैं. विपक्ष भी बिलकुल चुप है क्योंकि बरसों से चल रहे इस खेल में वह तो कहीं ज़्यादा दोषी है! फिर सरकार क्यों फ़िक्र करे? घोटाले को भरने के लिए जनता का पैसा है ही और जनता को भरमाये रखने के लिए जेएनयू जैसे मुद्दे हैं ही!

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क़मर वहीद नक़वी

स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही.