संघ क्यों चाहता है आरक्षण की समीक्षा?

जातिगत आरक्षण ख़त्म होते ही मायावती, मुलायम, लालू जैसे क़द्दावर नेताओं की ज़मीन और राजनीति ही ख़त्म हो जायेगी और इस तरह संघ के रास्ते के कुछ बड़े पहाड़ भी ध्वस्त हो जायेंगे, साथ ही जातीय पहचान अलग रखने के सारे तर्क और कारण भी ख़त्म हो जायेंगे. संघ जानता है कि जातिगत आरक्षण को ख़त्म किये बिना न तो जातीय क्षत्रपों को निष्प्रभावी किया जा सकता है और न ही हिन्दू राष्ट्र की अपील इन समूहों में कारगर हो सकती, जो देश की हिन्दू आबादी का तीन-चौथाई हिस्सा हैं.

सुना है संघ के पास आरक्षण का कोई नया समाधान है! लेकिन वह समाधान है क्या, इस पर बिहार चुनाव तक फ़िलहाल बिलकुल चुप्पी रहेगी. संघ के एक बड़े नेता इंद्रेश कुमार का ऐसा बयान अख़बारों में छपा है! तो चुनाव बीत जाये, फिर पता चलेगा कि संघ ने आरक्षण का कौन-सा नया फ़ार्मूला ढूँढा है! बहरहाल, अब तो बात साफ़ हो ही गयी! यही कि हार्दिक पटेल का शोशा यों ही नहीं उठ गया था! उठाया गया था! और तैयारी से उठाया गया था. तब उस आन्दोलन को लेकर जो अटकलें लगी थीं कि कौन उसके पीछे हो सकता है, वह यक़ीनन ग़लत नहीं थीं!

Why Sangh wants review of Caste based Reservation?

मोहन भागवत का पहला बयान

और इसलिए अब यह भी साफ़ हो गया है कि आरक्षण को लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत का पहला बयान भी यों ही नहीं आ गया था. बातों-बातों में वह बात निकल नहीं गयी थी, बल्कि सोच-समझ कर बोली गयी थी! अब यह अलग बात है कि लालू प्रसाद यादव की दहाड़ और बिहार चुनाव में नुक़सान की आशंका से बीजेपी ने सफ़ाई से कन्नी काट ली थी कि आरक्षण की समीक्षा का सरकार का कोई इरादा नहीं है! लेकिन संघ का इरादा तो पक्का है! क्योंकि बीजेपी की इस लीपापोती के बाद भी मोहन भागवत कुल्लू में फिर बोले कि आरक्षण पर चर्चा करना कोई बुरी बात नहीं और आज हर जाति और हर वर्ग आरक्षण माँग रहा है, यह हालत क्यों हुई, इस पर सोचना तो होगा. यानी बात बिलकुल साफ़ है. आरक्षण की समीक्षा संघ का नया एजेंडा है!

Economic Status or Caste based Reservation: Real Agenda behind this debate

क्या है राजस्थान का इशारा?

और अब इसी के साथ इस ख़बर को जोड़ कर देखिए कि बीजेपी शासित राजस्थान ने गूजरों को अलग से पाँच प्रतिशत और आर्थिक पिछड़ों को 14 प्रतिशत आरक्षण देने के दो बिल पास किये हैं और तमिलनाडु की तरह इसे भी संविधान की नौंवी अनुसूची में रखने की केन्द्र से सिफ़ारिश की है. यानी इशारा साफ़ है. अगर राजस्थान की तरह कुछ और राज्य ऐसे ही बिल पास करते हैं तो केन्द्र सरकार को उन्हें नौंवी अनुसूची में रखने का तगड़ा बहाना मिल जायेगा! महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण का मामला है ही. गुजरात में पटेलों के आन्दोलन को बेअसर करने के लिए हालाँकि मुख्यमंत्री आनन्दीबेन पटेल ने आर्थिक रूप से पिछड़े युवाओं को शिक्षा में के लिए आर्थिक मदद देने के लिए ‘मुख्यमंत्री युवा स्वावलम्बन योजना’ की घोषणा की है, लेकिन पटेल आन्दोलन अगर क़ाबू में न आया तो कल को वहाँ भी नये वर्गों को या आर्थिक आधार पर अलग से आरक्षण देने और आरक्षण का कोटा बढ़ाने के बिल पास किये जा सकते हैं. फिर देखादेखी दूसरे राज्यों में भी ऐसा करने की होड़ लगेगी. बीजू जनता दल के बड़े नेता तो पहले ही आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठा चुके हैं. अभी हाल में काँग्रेस के भी इक्का-दुक्का नेताओं ने आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत कर दी है. तो अगर एक-एक करके कई और राज्य राजस्थान की राह पकड़ते हैं तो आर्थिक आधार पर आरक्षण के लिए अच्छा समर्थन भी जुटाया जा सकेगा और फिर यही तर्क लेकर जातिगत आधार पर आरक्षण की मौजूदा पूरी व्यवस्था को ही बदलने की बहस तेज़ की जा सकेगी!

आरक्षण से उपजा नव-सामन्तवाद!

आख़िर संघ को जातिगत आरक्षण (Caste based Reservation) से समस्या क्या है? क्यों अचानक संघ ने आरक्षण की समीक्षा का राग छेड़ा? तर्क दिया जा रहा है कि जातिगत आरक्षण ने दलितों और पिछड़ों में कुछ जातियों के एक नव-सामन्तवाद को स्थापित किया है और अपने राजनीतिक वर्चस्व के कारण यही गिनी-चुनी जातियाँ आरक्षण का पूरा लाभ लूट रही हैं, जबकि आरक्षित वर्ग की तमाम दूसरी जातियाँ आरक्षण के लाभ से पूरी तरह वंचित रही हैं. यह बात बिलकुल सही है और आरक्षण पर अपने पिछले लेख में मैं भी यह बात कह चुका हूँ कि ऐसे उपाय किये जाने की ज़रूरत है कि आरक्षण के लाभ का बँटवारा सही तरीक़े से हो सके. लेकिन सवाल यह है कि क्या संघ भी इसीलिए आरक्षण की समीक्षा चाहता है कि आरक्षण का लाभ उसके सही हक़दारों को मिल सके? नहीं! संघ की मंशा यह क़तई नहीं है!

Caste based Reservation: A big hurdle in the way of 'Hindu Rashtra'

'हिन्दू राष्ट्र' के रास्ते की रुकावट!

दरअसल, संघ का मानना है और उसका यह मानना ग़लत नहीं है कि जब तक जातिगत आरक्षण (Caste based Reservation) की व्यवस्था चलती रहेगी, तब तक ‘हिन्दू राष्ट्र’ का उसका एजेंडा क़तई पूरा नहीं हो सकता! क्यों? हिन्दू राष्ट्र का लक्ष्य पाने के संघ के रास्ते में जातिगत आरक्षण सबसे बड़ी बाधा है, यह बात समझनी ज़रूरी है. आमतौर पर लोग समझते हैं कि जातिगत आरक्षण से शिक्षा और नौकरियों में अगड़ों के अवसर घटते हैं, इसीलिए संघ जैसे दक्षिणपंथी रुझानवाले संगठन इसका विरोध करते हैं. लेकिन बात इतनी सीधी नहीं है. दरअसल, जातिगत आरक्षण ने तमाम जातीय समूहों को अपने आपको एक अलग पहचान के रूप में स्थापित करने की आकाँक्षा दी और इसलिए उन्होंने अपने-अपने नेता पैदा किये, जो उनके हितों को आगे बढ़ा सकें. इसने देश में एक बिलकुल नये क़िस्म की सोशल इंजीनियरिंग और राजनीति को जन्म दिया. मायावती, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम माँझी से लेकर देश के तमाम राज्यों में छोटे-बड़े जातीय क्षत्रप आज जातिगत आरक्षण से उपजे इन्हीं जातीय समूहों का नेतृत्व करते हैं. ज़ाहिर है कि इन नेताओं का अस्तित्व और प्रासंगिकता तभी तक है, जब तक इनके अनुयायी जातीय समूह अपनी अलग पहचान पर क़ायम रहें. जातिगत आरक्षण (Caste based Reservation) इन समूहों को आपस में जोड़े रखने के लिए फ़ेविकोल जैसा काम करता है.

लस्टम-पस्टम काँग्रेस, बुढ़ाते क्षेत्रीय दल!

अब तक तो काँग्रेस ही संघ के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा थी, लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में हार के बाद से काँग्रेस जिस लस्टम-पस्टम तरीक़े से चल रही है और जिस नेतृत्व-शून्यता की शिकार है, उससे संघ लगभग आश्वस्त है कि काँग्रेस अब शायद ही कोई ठोस चुनौती पेश कर पाये. बच गये देश भर में बिखरे क्षेत्रीय दल. इनमें से ज़्यादातर दलों का नेतृत्व बुढ़ा रहा है और उनके यहाँ दूसरे नम्बर का नेतृत्व शून्य है. संघ को लगता है कि अगले कुछ वर्षों में बहुत-से राज्यों में वह बीजेपी के ज़रिए या तो क्षेत्रीय दलों को हाशिए पर ढकेल देने की स्थिति में होगी या फिर वह उसे चुनौती देने के बजाय उसके साथ आने को तैयार ही हो जायेंगे. लेकिन जातीय आधारित दल, चाहे वह अभी बीजेपी के साथ हों या उसके विरुद्ध, वह कभी भी जातीय राजनीति की अपनी ज़मीन नहीं छोड़ना चाहेंगे और कभी नहीं चाहेंगे कि उनके समूहों की जातीय पहचान ख़त्म हो.

साफ़-साफ़ दिखती मंज़िल!

जब तक जातिगत आरक्षण (Caste based Reservation) रहेगा, तब तक जाति की यह राजनीति चलती रहेगी, जातीय क्षत्रप बने रहेंगे, और तब तक यह अलग-अलग जातीय समूह उन क्षत्रपों के पीछे ही चलते रहेंगे और वह संघ की विराट हिन्दू पहचान के साथ कभी एकाकार नहीं होंगे. जातिगत आरक्षण ख़त्म होते ही मायावती, मुलायम, लालू जैसे क़द्दावर नेताओं की ज़मीन और राजनीति ही ख़त्म हो जायेगी और इस तरह संघ के रास्ते के कुछ बड़े पहाड़ भी ध्वस्त हो जायेंगे, साथ ही जातीय पहचान अलग रखने के सारे तर्क और कारण भी ख़त्म हो जायेंगे. संघ जानता है कि जातिगत आरक्षण को ख़त्म किये बिना न तो जातीय क्षत्रपों को निष्प्रभावी किया जा सकता है और न ही हिन्दू राष्ट्र की अपील इन समूहों में कारगर हो सकती, जो देश की हिन्दू आबादी का तीन-चौथाई हिस्सा हैं. इसलिए बीजेपी फ़िलहाल, अभी कुछ भी कहती रहे, जातिगत आरक्षण को ख़त्म करना संघ का ज़रूरी एजेंडा है. रास्ता क्या होगा, समय कितना लगेगा, यह अभी कहा नहीं जा सकता, लेकिन मंज़िल तो बिलकुल साफ़-साफ़ दिख रही है!

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क़मर वहीद नक़वी

स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही.