कुछ साल पहले कुछ लोगों ने सचिन को ‘एंडुलकर’ घोषित कर दिया. ‘एंडुलकर’ यानी जिसका अन्त हो चुका है. कोई और होता तो शायद ही ऐसा सुन कर सदमे से उबर पाता. लेकिन कमाल की चीज़ हैं सचिन. वह खेले, ख़ूब खेले और ऐसा खेले कि ‘एंडुलकर’ लिखनेवालों को याद ही नहीं रहा कि उन्होंने कभी तेंडुलकर को डस्टबिन में फेंक दिया था.
भगवानों के बिना भी क्या जीना? ज़िन्दगी की हज़ार झंझटें, हज़ारों हसरतें, लाखों मन्नतें, और मन में बसीं चमत्कारों की जन्नतें ही जन्नतें! इतना काम और एक भगवान! कैसे सम्भव है भला? सो, हर काम के लिए हमारे पास अलग-अलग भगवान हैं. मन्दिर, मसजिद, चर्च, गुरुद्वारों वाले भगवान अलग. पीर-फ़क़ीर, स्वामी, सन्त, बाबा टाइप अलग. फिर सिनेमा के, क्रिकेट के, राजनीति के, जाति के और भी न जाने किस-किस चीज़ के भगवान अलग
सचिन तेंडुलकर: क्रिकेटर से भगवान!
अब सचिन तेंडुलकर (Sachin Tendulkar) को ही लीजिए. मीडिया ने देखते ही देखते उन्हें क्रिकेटर से भगवान बना दिया, क्रिकेट का भगवान! और यह ‘भगवानी’ मिले उन्हें अभी दो-तीन साल ही हुए होंगे कि बेचारे को क्रिकेट से अपने संन्यास की घोषणा करने पर मजबूर होने पड़ा. और यह घोषणा भी कैसी? चुपचाप! अचानक और अकेले! क्या आपको नहीं लगता कि जिसे अापने क्रिकेट का भगवान (God of Cricket) बना दिया था, वह इन दिनों किस पीड़ा को भुगत रहा होगा कि उसने इस तरह अपने संन्यास का एलान किया. तीन लोगों को टेलीफ़ोन और बीसीसीआई को चिट्ठी लिखकर! न धूम, न धाम, न गाजा, न बाजा; एक चिट्ठी छोड़ चला गया क्रिकेट का राजा!
'एंडुलकर' से 'भगवान' सचिन!
बड़ी अजीब बात है. कुछ साल पहले कुछ लोगों ने सचिन को ‘एंडुलकर’ घोषित कर दिया. ‘एंडुलकर’ यानी जिसका अन्त हो चुका है. कोई और होता तो शायद ही ऐसा सुन कर सदमे से उबर पाता. लेकिन कमाल की चीज़ हैं सचिन. वह खेले, ख़ूब खेले और ऐसा खेले कि ‘एंडुलकर’ लिखनेवालों को याद ही नहीं रहा कि उन्होंने कभी तेंडुलकर को डस्टबिन में फेंक दिया था. वे सब झूम-झूम कर ‘भगवान’ सचिन की आरती गाने लगे! लेकिन कुछ ही दिन बाद उनकी याद्दाश्त फिर से धोखा दे गयी. फिर बतकहियाँ उठने लगीं, फिर कुलबुलाने लगा खटराग ‘इति प्रस्थान कालम्!’
पहले गावसकर, अब सचिन!
सचिन के साथ जो हुआ, उससे भी बुरा पहले सुनील गावसकर (Sunil Gavaskar) के साथ हो चुका है. जिन दिनों भारत के पास क्रिकेट में बेदी, प्रसन्ना, चन्द्रशेखर की स्पिन तिकड़ी के अलावा और कुछ ख़ास नहीं था, तब एक नाटे क़द के महानायक ने करिश्माई सफलता के कई आकाश रचे थे. जब यहाँ लोग डाॅन ब्रेडमैन और गैरी सोबर्स की तरफ़ चौंधियाई आँखों से तका करते थे, जब सारी दुनिया तूफ़ानी तेज़ गेंदबाज़ों से थरथराया करती थी, उन दिनों गावसकर ने अपने बल्ले का विश्वविजयी साम्राज्य स्थापित किया था!
लेकिन गावसकर को हम वह नहीं दे पाये, जो उन्हें मिलना चाहिए था. गावसकर तो ख़ैर बहुत विवादों में रहे, कप्तानी को लेकर, टीम में जगह को लेकर, तमाम तरह के वितंडों में वह फँसते-उतराते रहे. कई बार उन पर आरोप लगे कि वह केवल अपने लिए खेलते हैं, देश के लिए नहीं. सचिन और किसी विवादों में तो नहीं घिरे, हालाँकि संयोग यह कि उनके बारे में भी यह ख़ूब कहा गया कि वह ‘बेकार’ हो गये मैचों में ही जलवा दिखा पाये और संकट के समय अकसर टीम को उनकी मौजूदगी का फ़ायदा नहीं हुआ. लेकिन आँकड़े इन आरोपों को कभी साबित नहीं कर पाये.
पहले गावसकर, अब सचिन! दो महानायक, एक कहानी, एक हश्र! सचिन जैसी अद्भुत प्रतिभा करोड़ों-अरबों में कोई एक होती है. उन्हें भगवान बनाने की और फिर ऐसी बदरंग विदाई की ज़रूरत नहीं थी. वह भगवान नहीं, महानायक हैं. और एक महानायक कभी मरता नहीं, कभी लोगों की यादों से विदा नहीं होता.
'भगवान' नहीं, महानायक मानें बस!
मेहरबानी करके ‘भगवानों’ के कारोबार से सचिन को मुक्त ही रखिए. यह ठीक है कि चमत्कारों को नमस्कार वाले हम घोंघा बसन्तों को अपने-अपने हज़ारों भगवान बनाने में बड़ा मज़ा आता है. जो भी कोई चमत्कार दिखा दे या चमत्कार दिखाने का वादा या छलावा कर सकता हो, हम उसे तुरन्त ‘भगवान’ बना देते हैं. और अगर ऐसे किसी ‘भगवान’ ने कोई सन्तई, बाबाई या फ़क़ीरी चोला धारण कर रखा हो तो आँखें बन्द कर उसकी अन्धभक्ति में लीन रहते हैं. चाहे उसके कुकर्मों के कितने ही सबूत सामने न आ जायं. राजनीति में भी ऐसे ही तरह-तरह के ‘भगवान’ हैं. भक्तिविह्वल जनता ख़ुद को ठगाती रहती है और सच देख कर भी नहीं देखना चाहती. वह आँखें मूँदे ‘भक्ति’ में लीन रहती है, बारम्बार ठगे जाने के लिए समर्पित! सचिन को कभी ऐसा ‘भगवान’ बनने की ज़रूरत नहीं थी. करबद्ध प्रार्थना है कि मान सकें तो उसे महानायक मानें, कुछ और नहीं.