दिल्ली में उत्तर-पूर्व के लोगों के साथ एक के बाद एक लगातार हुए हादसे स्तब्धकारी हैं, शर्म की हद तक शर्मनाक हैं. हाल के कुछ दिनों में दिल्ली का नस्ली चेहरा बार-बार लगातार बेनक़ाब हुआ है! क्या यह बहुत बड़ी चिन्ता की बात नहीं है कि उत्तर-पूर्व के लोगों में कहीं यह ख़याल पनपने लगा है कि देश के बड़े शहरों में अपमान सह कर पढ़ाई-लिखाई करने, करियर बनाने से बेहतर है कि वे अपने राज्य में ही जैसे-तैसे, लेकिन इज़्ज़त से दिन गुज़ारें.
देश कहाँ रहता है? और कहाँ नहीं रहता है? सात बहनों ने यह सवाल फिर पूछा है! टेढ़ा सवाल है न! शायद किसी सिरफिरी पहेली जैसा. लोग जिसे लालबुझक्कड़ की तरह बूझने में लगे हैं! भला फिर जवाब कैसे मिले?
और सवाल सिर्फ़ सात बहनों का नहीं है. यह यक्ष प्रश्न है. जाने कितनी बार, कितनी ओर से पूछा गया और कंधे उचका कर टाल दिया गया! देश कहाँ रहता है? और कहाँ नहीं रहता है? बताइए! सवाल समझ में नहीं आया? या पूछने वाले के पेंच ढीले हैं, बे सिर-पैर की बकवास लगा रखी है उसने!
सात बहनें दिल्ली से पूछ रही हैं
न बकवास है, न पहेली! सवाल बिलकुल सीधा और साफ़ है. इस बार सवाल दिल्ली से उठा है. वैसे उठने को कहीं से भी उठ सकता है और उठता ही रहता है. सात बहनें दिल्ली से पूछ रही हैं कि वे यहाँ रहें या अपने गाँव लौट जायें? असम, त्रिपुरा, अरुणाचल, मिज़ोरम, मणिपुर, मेघालय और नगालैंड— उत्तर पूर्व के सात राज्य, इन्हें सात बहनें कहा जाता है.
दिल्ली में उत्तर-पूर्व के लोगों के साथ एक के बाद एक लगातार हुए हादसे स्तब्धकारी हैं, शर्म की हद तक शर्मनाक हैं. इसलिए नहीं कि उत्तर-पूर्व के राज्यों से यहाँ पढ़ने-लिखने, रोटी कमाने आये लोगों में से कुछ बेचारे अपराध की कुछ घटनाओं के शिकार हुए. अपने यहाँ तो पूरे देश में क़ानून-व्यवस्था की जैसी हालत है, तो अपराध का शिकार कोई भी, कहीं भी और कभी भी हो सकता है.
दिल्ली का नस्ली चेहरा
शर्म और चिन्ता की बात है कि हाल के कुछ दिनों में दिल्ली का नस्ली चेहरा बार-बार लगातार बेनक़ाब हुआ है! चिन्ता इसलिए कि दिल्ली के नस्ली बर्ताव को अब तक किसी तरह झेलते-पीते आ रहे लोगों के मन में अब यह बात कौंधने लगी है कि क्या उन्हें दिल्ली छोड़ कर अपने घरों को लौट जाना चाहिए? उन्हें उत्तर-पूर्व के उनके परिवार वालों से, सगे-सम्बन्धियों से फ़ोन आने शुरू हो गये कि उन्हें सब छोड़-छोड़ कर घर की राह पकड़नी चाहिए. यह ख़तरे की बड़ी घंटी है!
पुलिस और प्रशासन का रवैया भी अजीब
दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकॉनोमिक्स ने दिल्ली में बसे उत्तर-पूर्व के लोगों के बीच एक सर्वे किया. कुल 701 लोगों से बातचीत की गयी. इनमें से एक भी ऐसा नहीं था, जिसने यह कहा हो कि उसने दिल्ली में रहते हुए नस्ली भेदभाव को महसूस नहीं किया! यहाँ तक कि पुलिस और प्रशासन का रवैया भी उनके प्रति कुछ अलग नहीं है. वहाँ भी उन्हें अजीब नज़रों से ही देखा जाता है!
यानी इनमें से हरेक के लिए दिल्ली में रहना एक सतत डरावना अनुभव है! दिन-रात, सुबह-शाम, कभी भी दिल्ली में उनके साथ नस्ली हिक़ारत की कोई हरकत हो सकती है. और कुछ नहीं तो कोई भी उन्हें ‘चिंकी’ कह कर मुँह बिचका सकता है! दिल्ली वालों ने उनके बारे में तरह-तरह की मनगढ़न्त धारणाएँ पाल रखी हैं.
और सिर्फ़ दिल्ली वालों ने ही क्यों, देश के दूसरे शहरों से भी गाहे-बगाहे ऐसी ही बातें सामने आती रहती हैं! क्या उत्तर-पूर्व देश का हिस्सा नहीं है? क्या उत्तर-पूर्व के लोग देश के अपने नहीं हैं? क्या उन्हें अपनी संस्कृति, अपने रीति-रिवाजों के अनुसार देश में जीने, रहने-सहने का हक़ नहीं है? आप उन्हें अपने बराबर सम्मान देने को क्यों तैयार नहीं हैं? या क्यों तैयार नहीं हो पाते?
अपमान सहने को मजबूर उत्तर-पूर्व के लोग
और क्या यह बहुत बड़ी चिन्ता की बात नहीं है कि उत्तर-पूर्व के लोगों में कहीं यह ख़याल पनपने लगा है कि देश के बड़े शहरों में अपमान सह कर पढ़ाई-लिखाई करने, करियर बनाने से बेहतर है कि वे अपने राज्य में ही जैसे-तैसे, लेकिन इज़्ज़त से दिन गुज़ारें. और अगर यह सब ऐसे ही बिना रुके चलता रहा तो हम कहाँ जा पहुँचेंगे, यह किसी ने सोचा है? अगर नहीं सोचा है तो फ़ौरन सोचना चाहिए, सरकारों को, प्रशासन को, लोगों को, आपको, हमको, सबको. वरना अरुणाचल के किसी लड़के की हेयर स्टाइल पर कोई क्यों ऐसा ताना मारता कि उसे जान गँवानी पड़ जाती!
भैया, मद्रासी, बिहारी से मियाँ तक!
और बात सिर्फ़ उत्तर-पूर्व के लोगों के बारे में हमारी घोंघाबसन्ती की नहीं है. बात हमारी तम्बू मानसिकता की है. धर्म, जाति, नस्ल, प्रान्त के तम्बुओं में बँटे हुए हम सब इस कूढ़मगज़ी का शिकार हैं. उत्तर-पूर्व का आदमी देश के दूसरे हिस्सों में ‘चिंकी’ हो जाता है, उत्तर भारत का आदमी मुम्बई में ‘भैया’ हो जाता है, दक्षिण का आदमी उत्तर में ‘मद्रासी’ हो जाता है, कहीं कोई बिहारियों का मज़ाक़ उड़ाता है, मुसलमान बाक़ी समुदायों में ‘मियाँ भाई’ हो जाता है, कहीं ईसाइयों, कहीं दलितों, कहीं आदिवासियों के लिए तरह-तरह के जुमले और फ़िक़रे गढ़े जाते हैं.
खाँचे-खाँचे बँटे हुए, एक-दूसरे को ओछा, नीचा, टुच्चा, घटिया घोषित करते हुए हमें जो अतीव गौरव का आनन्द होता है, वह हमें कहाँ लेकर जायेगा सज्जनों? क्या देश ऐसे किसी मसाले-गारे से जोड़ा जा सकता है, जिसके रसायन का मूल चरित्र ही दूसरों की खिल्ली उड़ाना, बाँटना और भेद करना हो?
वोटतंत्र ने देश को बाँटतंत्र में बदला!
हमारे वोटतंत्र ने देश को बाँटतंत्र में बदल दिया है. बाँटो, बाँटो, बाँटते रहो. बात जोड़ने की करो, काम तोड़ने के करो! देश जुड़े न जुड़े, वोट जुड़ते रहेंगे! जोड़-तोड़ का ज़माना है. राजनीति जोड़-तोड़ की है. सरकार जोड़-तोड़ की है. चुनाव जोड़-तोड़ का है. अगली सरकार कैसे बने, जोड़-तोड़ चालू है. तोड़ो-जोड़ो, जोड़ो-तोड़ो! शार्ट कट में तो यह बड़ा मुफ़ीद फ़ार्मूला है, लेकिन कब शार्ट सर्किट हो जाय, ठिकाना नहीं!
इसलिए अगर कोई सोचता है कि एक दिन जादू की छड़ी लेकर कोई ऐसा राजनायक आयेगा, जो देश की समूची राजनीति बदल देगा, सारी गन्दगी छू मंतर हो जायगी, तो वह हसीन सपने देखता रहे! जैसा आटा होगा, राजनीति की रोटी वैसी ही बनेगी. इसलिए आटा बदलिए. अपने आपको खाँचों से निकालिए. आँखें खोलिए. अपने-अपने कुओं से बाहर निकलिए! और ढूँढिए कि देश कहाँ रहता है?