पन्द्रह अगस्त आ रहा है. लाल क़िले से अपने दूसरे भाषण के लिए नरेन्द्र मोदी तैयारी में जुटे हैं. मोदी बतायेंगे कि पिछले भाषण में जो- जो कहा था, वह सब काम शुरू हो चुका है— जन-धन योजना, मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया वग़ैरह-वग़ैरह. लेकिन पिछली बार जिस एक बड़ी बात पर उन्होंने अपना आधा भाषण ख़र्च किया था, पूरे साल वही बात उनके एजेंडे में ज़ोर-शोर से क्यों नहीं आ पायी.
तो मोदी जी फिर तैयार हो रहे हैं. नहीं, नहीं, विदेश यात्रा के लिए नहीं! लाल क़िले से अपने दूसरे भाषण के लिए! क्या बोलना है, क्या कहना है? तैयारी हो रही है. सब मंत्रालयों से पूछा गया है. किन योजनाएं पर क्या काम हुआ है? इस साल किसके-किसके पास क्या नया आइडिया है. इस बार के भाषण में कैसी योजनाओं की घोषणा की जाये? मंत्रीगण तो ख़ैर अपने-अपने आइडिया देंगे ही. कुछ आइडिया तो हमारे पास भी हैं. ऐसे आइडिया, जो उन्हें शायद कोई न दे! उनके मंत्रीगण तो क़तई नहीं दे सकते! देना भी चाहें, तो भी नहीं!
क्या होगा इस पन्द्रह अगस्त के भाषण में?
तेरह, चौदह और पन्द्रह! वह तेरह के लालन कालेज वाले पन्द्रह अगस्त का भाषण याद है आपको, जहाँ से मोदी ने लाल क़िले पर चढ़ाई की थी! और जब चौदह में वहाँ पहुँच गये, तो लाल क़िले के उनके पहले भाषण में वह सब मुद्दे लापता थे, जो लालन कालेज में चमकाये गये थे! न भ्रष्टाचार, न महँगाई, न काला धन, न सीमा पार की नापाक साज़िशें, कुछ भी नहीं. तो इस बार का भाषण कैसा होगा? पिछले भाषण पर कोई बात होगी? ज़रूर होगी! मोदी बतायेंगे कि पिछले भाषण में जो-जो कहा था, उसमें कितना काम हो चुका है! प्रधानमंत्री जन-धन योजना के तहत सत्रह करोड़ खातों में बीस हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा जमा हो चुके हैं, सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत छह सौ से ज़्यादा गाँवों को अपनाया जा चुका है, योजना आयोग की जगह नीति आयोग बन गया है, मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया और डिजिटल इंडिया कार्यक्रमों की घोषणा हो चुकी है, स्मार्ट सिटी की योजना तैयार है और ईंधन पर सब्सिडी में एक साल में 126 अरब रुपये की बचत की जा चुकी है.
तो सरकार ने इतना काम किया है. हाँ, काम तो किया है. इसमें शक नहीं. लेकिन इनमें से बहुत-सी चीज़ों का नतीजा जब दिखेगा या नहीं दिखेगा, तब ही उस पर बात हो सकती है. मिसाल के तौर पर यह अभी देखा जाना है कि जन धन योजना के खातों का बैंकों के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा, जो पहले से ही ‘एनपीए’ और डूबे हुए क़र्ज़ों के भारी दबाव में हैं. सांसद आदर्श ग्राम योजना देखने में तो बेहद आकर्षक लगती है, लेकिन कई सांसदों को लगता है कि यह कई कारणों से व्यावहारिक नहीं है. बहरहाल यह योजना बस अभी ही शुरू हो पायी है. बाक़ी सारी योजनाओं का भी यही हाल है, जो बस हाल में ही शुरू हुई हैं. उनके नतीजों पर चर्चा के लिए तो हमें मोदी के अगले साल के भाषण तक इन्तज़ार करना ही पड़ेगा, लेकिन फ़िलहाल, इस साल के भाषण के लिए नरेन्द्र मोदी ख़म ठोक कर कह सकते हैं कि पिछले पन्द्रह अगस्त को जो कहा था, उसमें कुछ छूटा नहीं है. सब शुरू कर दिया है! वैसे यूपीए वालों का कहना है कि ज़्यादातर योजनाएँँ तो उनकी ही हैं, मोदी जी तो बस उनकी रि-ब्राँडिंग, रि-पैकेजिंग कर चकाचक मार्केटिंग कर रहे हैं! ठीक है, तो यूपीए को किसने रोका था मार्केटिंग करने से?
क्या राजनीतिक दलों को काले चन्दे पर भी बोलेंगे मोदी?
पिछले साल काले धन पर बात नहीं हुई थी, हो सकता है इस बार हो, क्योंकि सरकार विदेश में पड़े काले धन को उजागर करने की एक योजना ला ही चुकी है. लेकिन घरेलू काले धन पर रोक कैसे लगे? और राजनीतिक दल जिस काले चन्दे से चलते हैं, उसे बन्द करने के लिए भी सरकार कुछ करेगी क्या? मोदी इस पर बोलेंगे या चुप रहेंगे? और मोदी क्या अपने उस दावे पर भी बोलेंगे कि 2015 के अन्त तक संसद को अपराधियों से मुक्त कर देंगे! फ़िलहाल तो वह तीस्ता सीतलवाड के एनजीओ के चन्दे के हिसाब-किताब और अरविन्द केजरीवाल की पार्टी को ‘अपराधियों से मुक्त’ करने में लगे हैं! पिछली बार के भाषण में तो बड़ी ऊँची-ऊँची बातें कही थीं उन्होंने. तब तो कहीं लगा ही नहीं था कि मोदी ऐसी टुच्ची राजनीति भी करेंगे! फिर जाने क्या हुआ? अपना ही कहा भूल गये या पुरानी आदत की मजबूरी? और भ्रष्टाचार की चर्चा तो ख़ैर इस बार नहीं ही होगी! क्यों? यह भी बताना पड़ेगा क्या!
पिछली बार के भाषण से मैं तो बड़ा ख़ुश हुआ था कि चलो, कम से कम नरेन्द्र मोदी ने तो देश का सारी समस्याओं की असली जड़ पकड़ ली और अपना आधा भाषण इसी पर रखा. कुछ याद आया आपको? नमो ने कहा था, अगर हर नागरिक एक-एक क़दम उठाये तो सवा अरब क़दम उठ जायेंगे! देश का हर नागरिक अपनी ज़िम्मेदारी निभाये, देश का हित देखे. डाक्टर गर्भ का लिंग परीक्षण न करें, माँ-बाप अगर बेटों पर ध्यान दें तो उन्हें आतंकवादी और बलात्कारी बनने से बचाया जा सकता है, लोग गलियों, सड़कों पर गन्दगी न करें, तो देश साफ़-सुथरा रहेगा, टूरिस्टों को यहाँ आना अच्छा लगेगा, वग़ैरह-वग़ैरह. देश की सारी समस्याओं की जड़ तो यही है कि लोग अपनी ज़िम्मेदारी को लेकर क़तई ईमानदार नहीं हैं. और अगर यह जड़ सही हो गयी, तो देश ऐसे ही सोने की चिड़िया बन जायेगा. लेकिन सवाल यही है कि यह हो कैसे? अब स्वच्छ भारत अभियान को ही ले लीजिए. बड़े तामझाम से शुरू हुआ. नयी-नयी झाड़ुओं के साथ ख़ूब फ़ोटो खिंचे. सौ करोड़ रुपये विज्ञापनों पर फुँक गये. लेकिन हुआ क्या? न कचरा कम हुआ, न कचरा डालनेवाले सुधरे. बाक़ी जगहों की तो छोड़ दीजिए, जहाँ-जहाँ बीजेपी की सरकारें हैं या नगरपालिकाएँ हैं, वहाँ भी कोई ऐसी कोशिश नहीं हुई कि शहर की हालत बदले!
बड़ी बातें ही क्यों पड़ी रह गयीं?
बीजेपी वालों ने ही अपने प्रधानमंत्री की बातों पर रत्ती भर भी अमल नहीं किया! और न ही मोदी को ही फ़ुर्सत रही कि कम से कम वह जनता को इस हद तक प्रेरित कर देते कि स्वच्छ भारत अभियान देश का राष्ट्रीय अभियान बन जाता और देश का एक-एक नागरिक इसमें शामिल हो गया होता. सिर्फ़ विज्ञापन देने, भाषण करने और फ़ोटो खिंचा लेने से तो यह होगा नहीं. मोदी ने साम्प्रदायिकता और जातिवाद जैसी बुराइयों पर दस साल के लिए रोक की अपील भी सबसे की थी, लेकिन परिवार के लोग पूरे साल ज़हर उगलते रहे. मतलब? क्या वह भाषण बस भाषण के लिए था?
नरेन्द्र मोदी को इस साल के भाषण के लिए बस मेरे पास एक ही आइडिया है. अगर आप सवा अरब क़दम उठवा सकें और इसी एकसूत्रीय कार्यक्रम पर पूरा ज़ोर लगा दें तो अपने आप देश का कायाकल्प हो जायेगा. लेकिन यह काम सिर्फ़ भाषण और विज्ञापन से नहीं होगा, ईमानदारी से होगा. पहले ख़ुद आप उस पर अमल करें, फिर आपकी पार्टी उस पर चले, परिवार चले, तो देश अपने आप चल पड़ेगा. ज़रूरी है कि सड़क का कचरा भी साफ़ हो और मन भी! बदले के बजाय बदलाव की राह पर चलें. दूसरे तो तभी बदलेंगे, जब आप भी कुछ बदलें, क्योंकि आप देश के प्रधानमंत्री हैं, नेता हैं. माना कि सिद्धाँत रूप से इफ़्तार पार्टियों का चोंचला आपको पसन्द न हो, मुझे भी क़तई पसन्द नहीं है. आप ख़ुद इफ़्तार पार्टी न दें. बिलकुल ठीक. लेकिन राष्ट्रपति की इफ़्तार पार्टी हो तो कम से कम प्रोटोकाॅल का ही सम्मान रख लेते! बहरहाल मर्ज़ी आपकी! लेकिन क्या आपके दिखाये इसी रास्ते पर देश को चलना चाहिए?
क्या राजनीतिक दलों को काले चन्दे पर भी बोलेंगे मोदी?
संघ का मतलब साफ़ है कि मुसलमानों को या किसी और भी धर्मावलम्बियों को भारत में हिन्दू तरीक़े से ही रहना होगा! पिछले नब्बे साल से संघ देश की प्रयोगशाला में चुपके-चुपके और अथक जो प्रयोग कर रहा था, उसका रसायन अब बिलकुल तैयार है! भारत के गाँवों में कभी कोई साम्प्रदायिक एहसास नहीं रहा, लेकिन पिछले पन्द्रह महीनों में शहर से लेकर गाँव तक अब देश की हिन्दू आबादी के बड़े हिस्से में मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हर भरा जा चुका है. पहले ‘घर वापसी’ और ‘लव जिहाद’ का शोर और फिर मुसलमानों की बढ़ती आबादी के बारे में जानबूझ कर झूठा हव्वा खड़ा करने की नियोजित कोशिश! यह सच है कि मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर अब भी हिन्दुओं के मुक़ाबले ज़्यादा है, लेकिन यह भी सच है कि पहले के मुक़ाबले मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर में भारी गिरावट दर्ज की गयी है और मुसलमानों में परिवार नियोजन के साधनों का प्रयोग तेज़ी से बढ़ा है. यही रफ़्तार रही तो जल्दी ही मुसलमानों की आबादी वृद्धि की दर राष्ट्रीय औसत के आसपास आ जायेगी. लेकिन प्रचार कुछ और किया गया.
उप-राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ भी निशाना
यही नहीं, संघ के बड़े नेताओं ने उप-राष्ट्रपति हामिद अन्सारी की देशभक्ति पर दो बार अनर्गल सवाल उठाये, जिसके लिए बाद में उन्हें माफ़ी भी माँगनी पड़ी. और जब कुछ नहीं बचा तो इस पर आपत्ति उठाने की कोशिश की उप-राष्ट्रपति ने मुसलमानों के पिछड़ेपन के बारे में बयान क्यों दिया? अच्छा, यदि उप-राष्ट्रपति यह कहते कि दलित बहुत पिछड़े हैं और उनके विकास पर ध्यान दिया जाना चाहिए, तो भी क्या यह ग़लत होता? मुसलमानों की हालत दलितों से ज़रा ही बेहतर है. तो उप-राष्ट्रपति ने यह बात कह कर क्या ग़लत किया? और राष्ट्रपति के. आर. नारायणन पर तो किसी ने कभी उँगली नहीं उठायी कि उन्होंने दलितों के पिछड़ेपन की चर्चा क्यों की? दलित हो कर दलित पिछड़ेपन की बात करना ग़लत नहीं, लेकिन मुसलमान हो कर मुसलमानों के पिछड़ेपन की चर्चा करना पाप है?
चुप क्यों बैठी है मोदी सरकार?
और दिलचस्प बात देखिए कि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार इन मुद्दों पर कभी कुछ नहीं बोली. न कोई ट्वीट, न कोई बयान, न किसी मन की बात में इस सबकी कोई चर्चा! जैसे कहीं कुछ हुआ ही न हो! सरकार इन घटनाओं के समर्थन में चुप है या मजबूरी में? दोनों ही स्थितियाँ चिन्ताजनक हैं! यह हुई तीन कहानियों को मिला कर बनी कहानी, देश के रंगमंच पर जिसके खेले जाने की शुरुआत अब हो चुकी है. यह तब तक जारी रहेगी, जब तक मुसलमान ‘हिन्दू तरीक़े’ से रहना नहीं सीख जायेंगे!
Muslim Fundamentalism always helped RSS to built its case!
मुसलमान भी कम दोषी नहीं!
अब वह कहानी, जो इसके समानान्तर चलती है. मुसलिम पर्सनल लाॅ बोर्ड, जो मुसलिम समाज के लिए लाये जानेवाले हर प्रगतिशील और सुधारात्मक क़ानून का ज़बरदस्ती विरोध करता रहा, उलेमा जो अनाप-शनाप फ़तवे देकर मुसलमानों को हर आधुनिक विचार का विरोधी साबित करते रहे, और सोने पर सुहागा आज़म ख़ाँ, अबू आज़मी, असदुद्दीन ओवैसी, उनके पिता सलाहुद्दीन ओवैसी, इब्राहीम सुलेमान सैत, जी. एम. बनातवाला, इमाम बुख़ारी और सैयद शहाबुद्दीन जैसे मुसलमानों के स्वयंभू नेता, जो मुसलमानों को भड़काये और बरगलाये रखने की राजनीति करते रहे. और इस तरह रची गयी मुसलिम साम्प्रदायिकता से इनकी दुकानें तो चलती रहीं, लेकिन इसने हिन्दू साम्प्रदायिकता को मुसलमानों के ख़िलाफ़ वे तर्क मुहैया कराये, जिन्हें आम हिन्दू आसानी से सही मानने लगें! क्या मुसलमान अब भी आत्मनिरीक्षण करेंगे कि देश के आम हिन्दुओं में उनके ख़िलाफ़ जो माहौल बना है, उसके ज़्यादातर हथियार ख़ुद मुसलमानों के ही दिये हुए हैं?
Secular Politics or Vote Politics!
मुल्लाओं की पिछलग्गू सेकुलर राजनीति!
और अब इन कहानियों के बीच की कहानी, तथाकथित सेकुलर राजनीति की कहानी, जिसने मुसलमानों के विकास के लिए तो कुछ नहीं किया, उलटे शाहबानो से लेकर इमराना बलात्कार कांड और आरिफ़-गुड़िया-तौफ़ीक़ जैसे मामलों में मुल्लाओं के सामने घुटने टेकने से लेकर तमाम ऐसे काम किये जिससे मुसलमानों का केवल नुक़सान हुआ. मुसलिम तुष्टीकरण के नाम पर सेकुलरिज़्म बदनाम ज़रूर हुआ, लेकिन मुसलमानों को मिला किया? धेला भी नहीं! और अब हिन्दुत्व की बहती बयार को देख कर काँग्रेस और सपा जैसी पार्टियों को डर लगने लगा है कि मुसलमानों के बारे में कुछ ज़्यादा बोलेंगे तो कहीं हिन्दू वोट हाथ से न निकल जायें! सेकुलरों के लिए भी यह गहरे आत्मनिरीक्षण का समय है कि उन्होंने कभी यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड पर बहस तक चलाने की भी पहल क्यों नहीं की?
बहरहाल, यह मसला केवल मुसलमानों का नहीं है. हो सकता है कल को मुसलमान ‘हिन्दू तरीक़े’ से रहने को मजबूर हो जायें. लेकिन तब हिन्दुओं के लिए भी यह देश बहुत बदल चुका होगा! राज्य को धर्म के रथ में जोते जाने का नतीजा क्या होता है, दुनिया में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है! कलबुर्गी जैसे तमाम लोगों को निशाना बना कर भविष्य के हिन्दू राष्ट्र की तसवीर तो पेश की ही जाने लगी है!