यह कैसा ‘बचकाना न्याय’ है?

जनभावनाओं के उबाल के बाद जिस तरह आनन-फ़ानन में राज्यसभा में किशोर न्याय बिल पास कराया गया, उसके कई बड़े ख़तरे हैं. भावनाओं के शोर में गढ़े गये कुछ झूठों और कुछ कपोल-कल्पित अवधारणाओं को स्थापित कर एक ऐसा माहौल बनाया गया कि जो पार्टियाँ पहले इस मुद्दे पर ठहर कर और समय लेकर विवेकपूर्ण चर्चा करने की बात कर रही थीं, वे भी लोकभावना के दबाव में बिल के समर्थन में आ गयीं.

लोग अब ख़ुश हैं. अपराध और अपराधियों के ख़िलाफ़ देश की सामूहिक चेतना जीत गयी. किशोर न्याय (Juvenile Justice) पर एक अटका हुआ बिल पास हो चुका है. अब कोई किशोर अपराधी उम्र के बहाने क़ानून के फंदे से नहीं बच पायेगा. किसी अटके हुए बिल ने आज तक देश की ‘सामूहिक चेतना’ को ऐसा नहीं झकझोरा, जैसा इस बिल ने किया. जाने कितने बिल संसद में बरसों बरस लटके रहे, लटके हुए हैं. लोकपाल तो पचास साल तक कई लोकसभाओं में कई रूपों में आता-जाता, अटकता-लटकता रहा. देश की सामूहिक चेतना नहीं जगी. महिला आरक्षण बिल भी बरसों से अटका हुआ है. उस पर भी देश की ‘सामूहिक चेतना’ अब तक नहीं जग सकी है! और शायद कभी जगे भी नहीं!

Passage of Juvenile Justice Bill: A tragedy of 'Collective Concious!'

किशोर न्याय और 'सामूहिक चेतना!'

यह ‘सामूहिक चेतना’ अकसर अचानक ही प्रकट हो जाती है. लोकपाल के मसले पर भी वह ऐसे ही अचानक जगी थी. यूपीए सरकार के कई मंत्री भ्रष्टाचार के नये महाकाव्य लिख रहे थे. अचानक अन्ना हज़ारे खड़े हुए और भीड़ खड़ी हो गयी. शहर-शहर, गली-गली धरने हुए. देश की ‘सामूहिक चेतना’ जग चुकी थी. लेकिन तब संसद ने आनन-फ़ानन में लोकपाल क़ानून नहीं बनाया. क्यों? बड़ा वाजिब तर्क था. क़ानून सड़क पर नहीं, संसद में बनता है. सोच-समझ कर बनता है. चर्चा होती है, बहस होती है. महीन-महीन बिन्दुओं की पड़ताल होती है. समय लगता है. पचास साल से आख़िर उस पर चर्चा हो ही रही थी. कुछ तय नहीं हो पा रहा था. इस बार क्यों पास हो गया? क्योंकि कोई पार्टी नहीं चाहती थी कि लोकपाल को अटकाने का ठीकरा चुनाव में उसके सिर फूटे. इसलिए लोकपाल बिल पास हो गया, लेकिन लोकपाल का बनना दो साल से अटका हुआ है. अब न भीड़ है, न नारे हैं, न अन्ना का कोई नामलेवा है, न मीडिया में कोई चर्चा है, न सोशल मीडिया में कोई शोर है. भ्रष्टाचार अब वैसी उत्तेजना पैदा नहीं करता!

Why Parliament was in so much hurry to pass Juvenile Justice Bill?

ऐसी जल्दी क्या थी?

‘निर्भया कांड’ ने विकृति, बर्बरता और पाशविकता की सारी हदें तोड़ दी थीं. उस पर देश का ऐसा आवेश, आक्रोश, क्षोभ होना ही चाहिए था, जो हुआ. उसके सारे अपराधियों को कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए, इससे शायद ही कोई असहमत हो. इसलिए इस मामले में एक किशोर की रिहाई के बाद तूफ़ान उठना भी बिलकुल जायज़ था. लेकिन यह संवाद बलात्कार ख़िलाफ़ बड़ा संघर्ष चलाने की दिशा में होना चाहिए था और ‘निर्भया’ उस संघर्ष की प्रतीक होती.

लेकिन जनभावनाओं के उबाल के बाद जिस तरह आनन-फ़ानन में राज्यसभा में किशोर न्याय बिल (Juvenile Justice Bill) पास कराया गया, उसके कई बड़े ख़तरे हैं. भावनाओं के शोर में गढ़े गये कुछ झूठों और कुछ कपोल-कल्पित अवधारणाओं को स्थापित कर एक ऐसा माहौल बनाया गया कि जो पार्टियाँ पहले इस मुद्दे पर ठहर कर और समय लेकर विवेकपूर्ण चर्चा करने की बात कर रही थीं, वे भी लोकभावना के दबाव में बिल के समर्थन में आ गयीं. इस बिल के पास होने न होने से उस किशोर की स्थिति पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ना है, क्योंकि उसका फ़ैसला तो पहले ही चुका, जिसे अब बदला नहीं जा सकता. फिर यह क़ानून बनाने की इतनी जल्दी क्यों थी?

भावनाओं में बहने के ख़तरे

क्या संसद को इस तरह भावनाओं में बह जाना चाहिए? और अगर संसद आज इस मुद्दे पर भावनाओं के आगे इस तरह झुक और दब सकती है, तो क्या यह बहुत ख़तरनाक नहीं है. कल को किसी भावनात्मक मुद्दे पर, किसी ‘आस्था’ के सवाल पर, किसी राजनीतिक-सांस्कृतिक एजेंडे पर जनता को भड़का कर, इकट्ठा कर क्या ऐसा दबाव नहीं बनाया जायेगा कि संसद ‘लोकभावना’ का आदर करते हुए वैसे क़ानून बना दे. क्या मीडिया और सोशल मीडिया पर बने दबाव के आगे राजनीतिक पार्टियाँ भविष्य में अपनी नीतियाँ और सिद्धाँत किनारे कर आत्मसमर्पण की मुद्रा में नहीं आयेंगी. आख़िर वोट किसे प्यारे नहीं होते? भारत जैसे देश में यह ख़तरे की बहुत बड़ी घंटी है.

अजीब तर्क और सच्चे-झूठे तथ्य

ख़ास कर तब, जबकि इसके लिए अजीब-अजीब तर्क और सच्चे-झूठे तथ्य दिये गये. ठीक वैसे ही जैसे कोई भीड़ अपने ‘हिंसक न्याय’ के पहले देती है. मसलन यह कि अगर कोई सोलह साल में बलात्कार करने लायक़ हो जाता है, तो वह उस अपराध की सज़ा भुगतने लायक़ क्यों नहीं? सवाल यह है कि क़ानून का मक़सद अपराध कम करना होना चाहिए या अपराधी बनाना? तमाम दुनिया के आँकड़े इस बात को साबित करते हैं कि वयस्क क़ैदियों के मुक़ाबले सुधारगृहों से निकले युवाओं में अपराधों को दोहराने का प्रतिशत काफ़ी कम रहता है. यानी किशोरों को अगर सुधारगृह के बजाय जेल भेजा जायेगा, तो सुधरने के बजाय उनके ज़्यादा अपराधी बनने की सम्भावनाएँ बहुत बढ़ जाती हैं. ज़ाहिर है कि यह क़ानून नये अपराधी तो बनायेगा, अपराध रोक पायेगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता.

नहीं बढ़े किशोर अपराध

एक तर्क यह भी दिया गया कि किशोर अपराधों की संख्या में सैंतालीस फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है. ग़ज़ब का अर्द्धसत्य है यह. आबादी बढ़ी तो अपराधों की संख्या भी बढ़ी. तो संख्या के हिसाब से देखेंगे तो यह इज़ाफ़ा वाक़ई भयानक लगेगा. लेकिन कुल अपराधों को देखें, तो उनमें पिछले ग्यारह सालों में किशोर अपराधों (Juvenile Crime) का प्रतिशत औसतन 1.2 के आसपास स्थिर रहा है. न घटा, न बढ़ा. इनमें भी क़रीब अस्सी फ़ीसदी मामले छोटे-मोटे अपराधों के रहे हैं. हत्या और बलात्कार के मामले क़रीब बीस फ़ीसदी के आसपास रहे. इसलिए किशोर अपराधों को लेकर ऐसी चिन्ता की कोई बात नहीं थी, जैसी तसवीर खींची गयी.

दूसरी बात यह कि आमतौर पर किशोर अपराधी बेहद ग़रीब तबके से आते हैं. लाख रुपये की सालाना आमदनी से भी कम कमाने वाले परिवारों में से, और उनमें से भी आधे तो पच्चीस हज़ार सालाना से कम पर गुज़र-बरस करनेवाले परिवारों से. क्या इनके अपराधी बन जाने के पीछे यह स्थितियाँ ज़िम्मेदार नहीं? और क्या इन्हें इस दयनीय स्थिति से उबारना, इनकी हालत सुधारना हमारी ज़िम्मेदारी नहीं? क्या यह सोचनेवाली बातें नहीं थीं? यह कैसा ‘बचकाना न्याय’ है?

Leave a Reply

क़मर वहीद नक़वी

स्वतंत्र स्तम्भकार. पेशे के तौर पर 35 साल से पत्रकारिता में. आठ साल तक (2004-12) टीवी टुडे नेटवर्क के चार चैनलों आज तक, हेडलाइन्स टुडे, तेज़ और दिल्ली आज तक के न्यूज़ डायरेक्टर. 1980 से 1995 तक प्रिंट पत्रकारिता में रहे और इस बीच नवभारत टाइम्स, रविवार, चौथी दुनिया में वरिष्ठ पदों पर काम किया. 13-14 साल की उम्र से किसी न किसी रूप में पत्रकारिता और लेखन में सक्रियता रही.