सरकार को उम्मीद है कि अगले डेढ़-दो वर्षों में वह बिना नक़दी की अर्थव्यवस्था के अपने अभियान को एक ऐसे मुक़ाम तक पहुँचा देगी, जहाँ से वोटरों को, ख़ास कर युवाओं को देश के ‘आर्थिक कायाकल्प’ की एक लुभावनी तसवीर दिखायी जा सके. पिछले चुनाव में अगर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ वोट का नारा था, तो 2019 में ‘ट्रांसपैरेंट क्लीन इंडिया’ जिताऊ नारा बन सकता है! अर्थव्यवस्था को काले धन और दो नम्बरी तरीक़ों से ‘स्वच्छ’ करना और ‘स्वच्छ भारत’ के ज़रिए गाँवों को खुले में शौच से मुक्त करना—मेरे ख़याल से 2019 में नरेन्द्र मोदी की मार्केटिंग योजना में यही दो ब्रह्मास्त्र होंगे.
काला धन बाहर निकालने के बहाने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस बार बड़ी दूर का पाँसा फेंका है. राह में जोखिम ही जोखिम हैं. दाँव सही पड़ गया तो 2019 में वह फिर अजेय हो कर दिल्ली की गद्दी पर लौटेंगे. और दाँव कहीं उलटा पड़ गया तो मोदी और बीजेपी का तो जो होना है, वह होगा ही, देश को भी उसकी भारी क़ीमत चुकानी होगी. और शायद इसीलिए मोदी सरकार मुसलमानों का अब तक का सबसे बड़ा ‘तुष्टिकरण’ करने का जोखिम उठाने को भी तैयार दिखती है! देश में इसलामी बैंकिंग या शरीआ बैंकिंग की शुरुआत पर गम्भीरता से बात हो रही है. हैरानी है कि इस पर सेकुलर जमात भी चुप है और संघ भी. विश्व हिन्दू परिषद या बजरंग दल वालों की घिग्घी भी बँधी हुई है. कहीं कोई चूँ-चपड़ तक नहीं हुई!
शरीआ बैंकिंग या इसलामी बैंकिंग क्यों?
आख़िर क्यों इसलामी बैंकिंग? क्या मजबूरी है? मुसलमानों ने तो कोई ऐसा दबाव सरकार पर नहीं डाला! फिर क्यों ऐसा? कहाँ तो संघ और बीजेपी शुरू से पर्सनल लॉ के विरोधी रहे हैं, एक देश, एक क़ानून की बात करते रहे हैं और कहाँ आज इस पर चर्चा हो रही है कि देश में ‘ब्याज मुक्त’ बैंकिंग या शरीआ बैंकिंग शुरू की जाय! क्या इससे यूनिफ़ार्म सिविल कोड को लेकर शुरू हुई पूरी बहस बेकार नहीं हो जायेगी? क्या यूनिफ़ार्म सिविल कोड का बीजेपी और संघ का मुद्दा सदा-सदा के लिए ख़त्म नहीं हो जायेगा?
हो तो जायेगा! मुसलमान कहेंगे कि अगर आप ख़ुद पहल कर हमारे लिए अलग शरीआ बैंकिंग मुहैया करा रहे हो, तो हमारे निजी मामलों में शरीआ क़ानूनों पर सवाल क्यों?
आ रहा है इसलामिक डेवलपमेंट बैंक
सच पूछिए तो किसी सेकुलर देश में न शरीआ बैंकिंग जैसी कोई चीज़ होनी चाहिए और न ही अलग-अलग धर्मों के माननेवालों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ. मुसलमान हमेशा से पर्सनल लॉ को लेकर टस से मस होने को तैयार नहीं, लेकिन शरीआ बैंकिंग तो कभी बड़ा क्या छोटा मुद्दा भी नहीं बनी. तो फिर क्यों रिज़र्व बैंक ने सरकार को सुझाव भेजा है कि सामान्य बैंकों में ही शरीआ बैंकिंग की अलग से खिड़की खोली जा सकती है? यही नहीं 56 इसलामी देशों की भागीदारी वाले इसलामिक डेवलपमेंट बैंक की भारत में पहली शाखा अहमदाबाद में खोले जाने की तैयारी हो रही है. हालाँकि शरीआ बैंकिंग के लिए मौजूदा बैंकिंग क़ानूनों में बदलाव करने पड़ेंगे.
मुसलमानों को बैंकिंग नेटवर्क में लाना ही पड़ेगा!
वजह बस एक और सिर्फ़ एक है. मुसलमानों को बैंकिंग नेटवर्क में लाये बिना नरेन्द्र मोदी ‘कैशलेस इकॉनॉमी’ यानी बेनक़दी अर्थव्यवस्था का अपना एजेंडा लागू ही नहीं कर सकते. ‘कैशलेस इकॉनॉमी’ यानी जहाँ नक़द करेन्सी इस्तेमाल न हो. सब कुछ या तो चेक या डिमांड ड्राफ़्ट या क्रेडिट-डेबिट कार्ड या मोबाइल वॉलेट या ऑनलाइन या ऐसे ही किसी बैंकिंग माध्यम से हो.
काला धन नहीं, असली मुद्दा 'कैशलेस सोसाइटी' का!
इसलिए मौजूदा नोटबदल को लेकर क़तई मुग़ालते में मत रहिए. यह कोई पचास दिन की बात नहीं है. और यह सब सिर्फ़ नोटबदल नहीं है और न सिर्फ़ काले धन या फ़र्ज़ी नोटों को पकड़ने की बात है. न यह कि कुछ दिनों बाद सब पहले जैसा हो जायेगा. न यह कि बैंकों से नक़दी निकालने की जो सीमा है, वह खुल जायेगी. मेरा अनुमान है कि आनेवाले दिनों में यह सीमा और घटेगी ही, बढ़ेगी नहीं! बल्कि आनेवाले दिनों में सरकार का पूरा ज़ोर इस बात पर रहनेवाला है कि कैसे हर छोटा-बड़ा आदमी बिना करेन्सी के लेन-देन करने लगे. छह महीने पहले मई में ही अपनी ‘मन की बात’ में मोदी ने खुल कर ‘कैशलेस सोसायटी’ की बात की थी और कहा था कि ‘यह काम कम समय में होगा, तो अच्छा होगा.’ तब उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया था, लेकिन मोदी ने अब बता दिया कि तब उन्होंने वह बात कितनी गम्भीरता से कही थी.
अर्थव्यवस्था को झटके लगेंगे, तो लगें
तो अगले ढाई साल यही मुद्दा रहेगा. देश को ‘कैशलेस सोसायटी’ में बदलने का अभियान चलेगा. इसलिए तय तौर पर बाज़ार में करेन्सी की कमी जस की तस बनाये रखी जायेगी ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग बिना नक़दी वाले लेन-देन को अपनाने पर मजबूर हों. सरकार को मालूम है कि उसके इस अभियान से अर्थव्यवस्था को झटके लगेंगे, जीडीपी की वृद्धि दर गिरेगी और इन झटकों का असर शायद अगले साल-डेढ़ तक महसूस होता रहे. उपभोग में कमी आयेगी, उत्पादन गिरेगा, नक़दी पर चलनेवाले कारोबार की हालत ख़राब होगी, असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों, किसानों, ग्रामीण इलाक़ों में और अब तक बैंकिंग से दूर रहनेवाले हर आदमी और हर इकाई को भारी परेशानी और दबाव झेलना होगा और अन्ततः उन्हें थक-हार कर किसी न किसी बैंकिंग चैनल की शरण लेनी पड़ेगी.
2019 का जिताऊ नारा : 'ट्रांसपैरेंट क्लीन इंडिया!'
लेकिन सरकार को उम्मीद है कि अगले डेढ़-दो वर्षों में वह बिना नक़दी की अर्थव्यवस्था के अपने अभियान को एक ऐसे मुक़ाम तक पहुँचा देगी, जहाँ से वोटरों को, ख़ास कर युवाओं को देश के ‘आर्थिक कायाकल्प’ की एक लुभावनी तसवीर दिखायी जा सके. पिछले चुनाव में अगर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ वोट का नारा था, तो 2019 में ‘ट्रांसपैरेंट क्लीन इंडिया’ जिताऊ नारा बन सकता है! अर्थव्यवस्था को काले धन और दो नम्बरी तरीक़ों से ‘स्वच्छ’ करना और ‘स्वच्छ भारत’ के ज़रिए गाँवों को खुले में शौच से मुक्त करना—मेरे ख़याल से 2019 में नरेन्द्र मोदी की मार्केटिंग योजना में यही दो ब्रह्मास्त्र होंगे, जिनसे वह विपक्ष को बेबस करना चाहेंगे. क्योंकि विकास की जिस लहर पर सवार हो कर वह दिल्ली पहुँचे थे, उसकी कोई चमकीली कहानी उनके पास न तो अभी है और न तब तक हो पायेगी.
क्या होगा 'कैशलेस इकॉनॉमी' से?
देखने में ‘कैशलेस सोसायटी’ की बात वाक़ई बड़ी चमकदार लगती है. शतरंज के ग्रैंडमास्टर और चर्चित अर्थशास्त्री केनेथ रोगॉफ़ ने अपनी ताज़ा किताब ‘द कर्स ऑफ़ कैश’ (नक़दी का अभिशाप) में ‘कैशलेस सोसायटी’ की ज़ोरदार वकालत करते हुए कहा है कि अगर नक़दी हो ही नहीं, और सारा लेन-देन आनलाइन हो, तो काला धन, भ्रष्टाचार, धन-धुलाई, टैक्स चोरी, ड्रग व मानव तस्करी, उगाही या फिरौती के लिए अपहरण या ऐसे ही बहुत-से अपराध नहीं होंगे, आतंकवादियों को पैसा नहीं मिल सकेगा और फ़र्ज़ी करेन्सी का तो सवाल ही नहीं होगा. नरेन्द्र मोदी के तर्क भी यही हैं और इसीलिए वह जल्दी से जल्दी देश को ‘कैशलेस इकॉनॉमी’ में बदलने को आतुर हैं.
'कैशलेस सोसायटी' : बहुत-से तर्क सही नहीं हैं
यह तो ठीक है कि इससे टैक्स के दायरे में बहुत-से नये लोग आ जायेंगे, लेकिन इसके बावजूद ‘कैशलेस सोसायटी’ के पक्ष में दिये जा रहे बहुत-से तर्क सही नहीं हैं. मसलन यह कैसे मान लिया जाय कि आनलाइन लेन-देन से घूसख़ोरी बन्द हो जायेगी! आज भी फ़र्ज़ी कम्पनियाँ बना कर उनमें घूस की बड़ी-बड़ी रक़म जमा करने के कई मामले हमारे सामने हैं. कल को छोटे स्तर पर कोई क्लर्क, कोई अफ़सर अपने किसी रिश्तेदार के नाम से कोई कम्पनी, कोई फ़र्म बना कर यही काम नहीं करेगा, यह कैसे कहा जा सकता है. इसी तरह फ़र्ज़ी कम्पनियों का मकड़जाल बना कर और ‘ओवर या अंडर इन्वाइसिंग’ कर बाक़ायदा बैंकिंग चैनलों के ज़रिए धन-धुलाई और टैक्स चोरी आज भी हो रही है, तो कल क्यों नहीं होगी? डोनाल्ड ट्रम्प अगर अमेरिका जैसे देश में ‘चतुराई’ से टैक्स बचा सकते हैं, तो ऐसा बाक़ी जगह क्यों नहीं हो सकता? और इसकी क्या गारंटी है कि आतंकवादी और अपराधी अपने नये तरीक़े नहीं ढूँढ लेंगे. आख़िर इंटरनेट आने के बाद ऐसे बहुत-से अपराधों का आविष्कार हुआ, जो पहले थे ही नहीं.
ख़तरे 'कैशलेस इकॉनॉमी' के
उधर ‘कैशलेस इकॉनॉमी’ के अपने ख़तरे हैं. सबसे बड़ी बात यही है कि नक़दी न रहने से जनता का सारा पैसा बैंकों में रहेगा. यानी जनता का अपने पैसे पर कोई नियंत्रण होगा ही नहीं. तब सरकारें आपके पैसे को लेकर मनमानी नहीं करेंगी, यह कैसे कहा जा सकता है? और फिर मन्दी के दौर में या उद्योगों को सस्ता क़र्ज़ देने के लिए ऐसा क्यों न होगा कि अपना पैसा बैंक में रखने के लिए आपसे ही ब्याज वसूला जाने लगे. ऋणात्मक ब्याज दर तो हम जानते ही हैं. और बैंक डूबे तो क्या होगा? हमारे ही नहीं, दुनिया भर के बैंक अरबों-खरबों का क़र्ज़ किस तरह डुबा चुके हैं, यह हमारे सामने है ही. और हो सकता है कि बहुत-से एनजीओ या राजनीतिक संगठन या विचारधारा सरकार को अकारण ही पसन्द न हो, ऐसे में सरकार की नाराज़गी के डर से उनकी आर्थिक मदद से लोग कतराने लगेंगे. ग्रीनपीस और तीस्ता सीतलवाड के उदाहरण सामने हैं, जिनका दम घोंटने के लिए क्या-क्या नहीं किया गया.
इसमें कोई दो राय नहीं कि टेक्नॉलॉजी आज नहीं, तो कल पूरी दुनिया को ख़ुद-ब-ख़ुद नक़दी विहीन समाज में बदल देगी. लेकिन उसके पहले उन ख़तरों पर गम्भीरता से चर्चा तो होनी ही चाहिए, जो ‘कैशलेस सोसायटी’ से उपज सकते हैं. लोकतंत्र के सुरक्षा कवचों को भेद कर सरकारें एक जबरे निगरानी तंत्र में न बदल जायें, क्या इस पर बात नहीं होनी चाहिए? ख़ास कर अपने देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं और मूल्यों का जो हाल है, उसे देखते हुए यह गम्भीर मुद्दा है.
एक और आख़िरी बात. भारत में हुए नोटबदल पर टिप्पणी करते हुए केनेथ रोगॉफ़ ने कहा है कि ‘कैशलेस सोसायटी’ का उनका ख़ाका विकासशील देशों के लिए नहीं था, जहाँ बड़ी संख्या में लोग बैंकिंग के दायरे में नहीं हैं. दूसरी बात यह कि करेन्सी को धीरे-धीरे वापस लिया जाना चाहिए और इसके लिए पाँच-सात साल का समय दिया जाना चाहिए. भारत में जो किया गया, वह अति महत्तवाकांक्षी है और बरसों बाद ही यह पता चल पायेगा कि इतिहास ने इस क़दम को कैसे आँका.