दादरी और कानपुर की घटनाओं ने बता दिया कि पिछले नब्बे साल से संघ देश की प्रयोगशाला में चुपके-चुपके और अथक जो प्रयोग कर रहा था, उसका रसायन अब बिलकुल तैयार है! मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हर गाँव-गाँव तक फैलाया जा चुका है. मोदी सरकार चुप है, समर्थन में या मजबूरी में? लेकिन आम हिन्दुओं के मन में मुसलमानों के ख़िलाफ़ माहौल बनाने में दोष ख़ुद मुसलमानों का भी कम नहीं है और सेकुलर राजनीति का भी, जो हमेशा मुल्लाओं की पिछलग्गू बनी रही!
तीन कहानियाँ हैं! तीनों को एक साथ पढ़ सकें और फिर उन्हें मिला कर समझ सकें तो कहानी पूरी होगी, वरना इनमें से हर कहानी अधूरी है! और एक कहानी इन तीनों के समानान्तर है. ये दोनों एक-दूसरे की कहानियाँ सुनती हैं और एक-दूसरे की कहानियों को आगे बढ़ाती हैं. और एक कहानी इन दोनों के बीच है, जिसे अकसर रास्ता समझ में नहीं आता. और ये सब कहानियाँ बरसों से चल रही हैं, एक-दूसरे के सहारे! विकट पहेली है. समझ कर भी किसी को समझ में नहीं आती!
Dadri Killing: Communal Hatred has spread deep into villages too
पहली कहानी. एक देश है, जो ए.पी. जे. अब्दुल कलाम के निधन पर दिल की गहराइयों से शोक में डूब जाता है. दूसरी कहानी. एक मंत्री है, जो कहता है कि मुसलमान होने के बावजूद कलाम राष्ट्रवादी थे! तीसरी कहानी. देश की राजधानी के ठीक दरवाज़े पर एक गाँव में भीड़ अचानक एक मुसलिम घर पर हमला करती है, इस शक में कि उसने गाय काटी है और परिवार के मुखिया को मौत के घाट उतार देती है. एक और ऐसा ही हादसा कानपुर के जाना गाँव में होता है. एक अनजान आदमी के लिए कोई बोल देता है कि यह पाकिस्तानी आतंकवादी है और भीड़ उसे मौत के घाट उतार देती है!
बिसाहड़ा की कहानी
दादरी के बिसाहड़ा (Bisara or Bisada village) गाँव में कभी कोई साम्प्रदायिक माहौल नहीं रहा. कम से कम ऊपर से तो नहीं दिखा. जिस अख़लाक़ को मारा गया, गाँव के हर घर में उसका आना-जाना था, किसी की बिजली ठीक करनी हो, किसी का पम्प ख़राब हो गया हो, किसी की कोई मशीन बिगड़ गयी हो. अख़लाक़ के घर की औरतें राजपूतों के इस गाँव की औरतों के कपड़े सी कर महीने में दो-ढाई हज़ार कमा लेती थीं. मतलब यह कि बरसों से इस परिवार का पूरे गाँव से मिलना-जुलना, बोलना-बतियाना, काम-धाम और खान-पान का रिश्ता था. हर साल की तरह इस बार भी अभी बक़रीद के दिन पड़ोस के बहुत-से हिन्दू दोस्त घर आये थे. फिर अचानक क्या हुआ कि एक मन्दिर से घोषणा हो कि अख़लाक़ ने गाय काटी है और फिर सारा गाँव उसकी जान लेने पर उतारू हो जाये?
BJP Minister says, Dadri killing was an 'Accident!'
मुसलमानों के ख़िलाफ़ बनी गाँठ
संस्कृति मंत्री महेश शर्मा कहते हैं कि यह दुर्घटना थी. लेकिन सच यह है कि यह अचानक नहीं हुआ था. वारदात के तीन दिन पहले अख़लाक़ के बेटे को गुज़रते देख किसी ने जुमला कसा था, देखो पाकिस्तानी जा रहा है! मतलब यह कि मन में गाँठ बहुत गहरे बैठी हुई थी या बैठायी जा चुकी थी कि मुसलमान है, तो वह भारतीय नहीं है, उसे भारत में नहीं रहना चाहिए, वह पाकिस्तानी है, वह कभी भारत का हो ही नहीं सकता! पिछले काफ़ी समय से संघ और बीजेपी के कई नेता मुसलमानों को लगातार पाकिस्तान भेजे जाने की वकालत अनायास ही नहीं करते रहे हैं और यही वह गाँठ है, जो देश के संस्कृति मंत्री के मन से अचानक बाहर आ जाती है कि मुसलमान होने के बावजूद कलाम राष्ट्रवादी थे! यानी मुसलमान राष्ट्रवादी हो नहीं सकते! और कलाम क्यों राष्ट्रवादी थे? इसलिए कि वह गीता पढ़ते थे. वह सरस्वती वन्दना करते थे! यानी जो मुसलमान गीता न पढ़े, जो सूर्य नमस्कार न करे, वह राष्ट्रवादी नहीं? अब इसको संघ प्रमुख मोहन भागवत के पिछले साल के इस बयान से जोड़ कर देखिए कि “आपस में इस लड़ाई को लड़ते-लड़ते ही भारत के हिन्दू- मुसलमान साथ रहने का कोई तरीक़ा ढूँढ लेंगे और वह तरीक़ा हिन्दू तरीक़ा होगा.”
भागवत के इस बयान को यहाँ सुना जा सकता है:https://youtu.be/518e9cdCMyI
The 'Hindu Way' of RSS!
क्या है संघ का हिन्दू तरीक़ा?
संघ का मतलब साफ़ है कि मुसलमानों को या किसी और भी धर्मावलम्बियों को भारत में हिन्दू तरीक़े से ही रहना होगा! पिछले नब्बे साल से संघ देश की प्रयोगशाला में चुपके-चुपके और अथक जो प्रयोग कर रहा था, उसका रसायन अब बिलकुल तैयार है! भारत के गाँवों में कभी कोई साम्प्रदायिक एहसास नहीं रहा, लेकिन पिछले पन्द्रह महीनों में शहर से लेकर गाँव तक अब देश की हिन्दू आबादी के बड़े हिस्से में मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हर भरा जा चुका है. पहले ‘घर वापसी’ और ‘लव जिहाद’ का शोर और फिर मुसलमानों की बढ़ती आबादी के बारे में जानबूझ कर झूठा हव्वा खड़ा करने की नियोजित कोशिश! यह सच है कि मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर अब भी हिन्दुओं के मुक़ाबले ज़्यादा है, लेकिन यह भी सच है कि पहले के मुक़ाबले मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर में भारी गिरावट दर्ज की गयी है और मुसलमानों में परिवार नियोजन के साधनों का प्रयोग तेज़ी से बढ़ा है. यही रफ़्तार रही तो जल्दी ही मुसलमानों की आबादी वृद्धि की दर राष्ट्रीय औसत के आसपास आ जायेगी. लेकिन प्रचार कुछ और किया गया.
उप-राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ भी निशाना
यही नहीं, संघ के बड़े नेताओं ने उप-राष्ट्रपति हामिद अन्सारी की देशभक्ति पर दो बार अनर्गल सवाल उठाये, जिसके लिए बाद में उन्हें माफ़ी भी माँगनी पड़ी. और जब कुछ नहीं बचा तो इस पर आपत्ति उठाने की कोशिश की उप-राष्ट्रपति ने मुसलमानों के पिछड़ेपन के बारे में बयान क्यों दिया? अच्छा, यदि उप-राष्ट्रपति यह कहते कि दलित बहुत पिछड़े हैं और उनके विकास पर ध्यान दिया जाना चाहिए, तो भी क्या यह ग़लत होता? मुसलमानों की हालत दलितों से ज़रा ही बेहतर है. तो उप-राष्ट्रपति ने यह बात कह कर क्या ग़लत किया? और राष्ट्रपति के. आर. नारायणन पर तो किसी ने कभी उँगली नहीं उठायी कि उन्होंने दलितों के पिछड़ेपन की चर्चा क्यों की? दलित हो कर दलित पिछड़ेपन की बात करना ग़लत नहीं, लेकिन मुसलमान हो कर मुसलमानों के पिछड़ेपन की चर्चा करना पाप है?
चुप क्यों बैठी है मोदी सरकार?
और दिलचस्प बात देखिए कि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार इन मुद्दों पर कभी कुछ नहीं बोली. न कोई ट्वीट, न कोई बयान, न किसी मन की बात में इस सबकी कोई चर्चा! जैसे कहीं कुछ हुआ ही न हो! सरकार इन घटनाओं के समर्थन में चुप है या मजबूरी में? दोनों ही स्थितियाँ चिन्ताजनक हैं! यह हुई तीन कहानियों को मिला कर बनी कहानी, देश के रंगमंच पर जिसके खेले जाने की शुरुआत अब हो चुकी है. यह तब तक जारी रहेगी, जब तक मुसलमान ‘हिन्दू तरीक़े’ से रहना नहीं सीख जायेंगे!
Muslim Fundamentalism always helped RSS to built its case!
मुसलमान भी कम दोषी नहीं!
अब वह कहानी, जो इसके समानान्तर चलती है. मुसलिम पर्सनल लाॅ बोर्ड, जो मुसलिम समाज के लिए लाये जानेवाले हर प्रगतिशील और सुधारात्मक क़ानून का ज़बरदस्ती विरोध करता रहा, उलेमा जो अनाप-शनाप फ़तवे देकर मुसलमानों को हर आधुनिक विचार का विरोधी साबित करते रहे, और सोने पर सुहागा आज़म ख़ाँ, अबू आज़मी, असदुद्दीन ओवैसी, उनके पिता सलाहुद्दीन ओवैसी, इब्राहीम सुलेमान सैत, जी. एम. बनातवाला, इमाम बुख़ारी और सैयद शहाबुद्दीन जैसे मुसलमानों के स्वयंभू नेता, जो मुसलमानों को भड़काये और बरगलाये रखने की राजनीति करते रहे. और इस तरह रची गयी मुसलिम साम्प्रदायिकता से इनकी दुकानें तो चलती रहीं, लेकिन इसने हिन्दू साम्प्रदायिकता को मुसलमानों के ख़िलाफ़ वे तर्क मुहैया कराये, जिन्हें आम हिन्दू आसानी से सही मानने लगें! क्या मुसलमान अब भी आत्मनिरीक्षण करेंगे कि देश के आम हिन्दुओं में उनके ख़िलाफ़ जो माहौल बना है, उसके ज़्यादातर हथियार ख़ुद मुसलमानों के ही दिये हुए हैं?
Secular Politics or Vote Politics!
मुल्लाओं की पिछलग्गू सेकुलर राजनीति!
और अब इन कहानियों के बीच की कहानी, तथाकथित सेकुलर राजनीति की कहानी, जिसने मुसलमानों के विकास के लिए तो कुछ नहीं किया, उलटे शाहबानो से लेकर इमराना बलात्कार कांड और आरिफ़-गुड़िया-तौफ़ीक़ जैसे मामलों में मुल्लाओं के सामने घुटने टेकने से लेकर तमाम ऐसे काम किये जिससे मुसलमानों का केवल नुक़सान हुआ. मुसलिम तुष्टीकरण के नाम पर सेकुलरिज़्म बदनाम ज़रूर हुआ, लेकिन मुसलमानों को मिला किया? धेला भी नहीं! और अब हिन्दुत्व की बहती बयार को देख कर काँग्रेस और सपा जैसी पार्टियों को डर लगने लगा है कि मुसलमानों के बारे में कुछ ज़्यादा बोलेंगे तो कहीं हिन्दू वोट हाथ से न निकल जायें! सेकुलरों के लिए भी यह गहरे आत्मनिरीक्षण का समय है कि उन्होंने कभी यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड पर बहस तक चलाने की भी पहल क्यों नहीं की?
बहरहाल, यह मसला केवल मुसलमानों का नहीं है. हो सकता है कल को मुसलमान ‘हिन्दू तरीक़े’ से रहने को मजबूर हो जायें. लेकिन तब हिन्दुओं के लिए भी यह देश बहुत बदल चुका होगा! राज्य को धर्म के रथ में जोते जाने का नतीजा क्या होता है, दुनिया में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है! कलबुर्गी जैसे तमाम लोगों को निशाना बना कर भविष्य के हिन्दू राष्ट्र की तसवीर तो पेश की ही जाने लगी है!