पाकिस्तान इधर बात करता है, उधर पीठ में छुरी घोंपता है. वह करगिल में धोखे की जंग कर चुका, संसद पर हमला करा चुका, मुम्बई पर हमला करा चुका और अब उफ़ा वार्ता के बाद फिर वही हो रहा है. पाकिस्तान क्या भारत के धैर्य की परीक्षा ले रहा है? क्या वह भारत को उकसा रहा है कि म्याँमार जैसी कार्रवाई करके दिखाओ? और अगर ऐसा है तो क्या भारत को इस ‘ट्रैप’ में फँसना चाहिए?
पाकिस्तान है कि मानता नहीं! मुँह में बात, बग़ल में छुरी! इधर बात, उधर छुरी! हम बतकही करते हैं, पाकिस्तान बतछुरी करता है! हर बार यही होता है. इस बार भी यही हुआ. वहाँ उफ़ा में बात हुई. यहाँ बधाईबाज़ों ने महिमागान शुरू किया. इधर अभी साझा बयान पर इतराने की अँगड़ाई उठी ही थी कि उधर जवाब में सीमा पार से बन्दूक़ों की आतिशबाज़ी चल पड़ी. कहीं कोई कोर-कसर बाक़ी न रह जाये, कहीं बातचीत का ‘असली’ नतीजा समझने में कोई ग़लतफ़हमी न रह जाये, इसलिए उधर से सशरीर कई आतंकवादी तोहफ़े भी फटाफट भेज दिये गये. पूरे सबूतों के साथ कि वे सारे के सारे पाकिस्तानी ही हैं. लो, कर लो बात!
पाकिस्तान के तीन प्लान!
पिछले क़रीब चालीस बरसों से पाकिस्तान यही कर रहा है. वह इधर बात करता है, उधर पीठ में छुरी घोंपता है. वह करगिल में धोखे की जंग कर चुका, संसद पर हमला करा चुका, मुम्बई पर हमला करा चुका और अब फिर वह पिछले कुछ दिनों से लगातार भारत को मुँह चिढ़ा रहा है. सीमा पर गोलीबारी और आतंकवादियों की नयी टोलियों के साथ वह पूरी बेशर्मी से अपनी साज़िशों में लगा है. क्या वह भारत के धैर्य की परीक्षा ले रहा है? क्या वह भारत को उकसा रहा है कि म्याँमार जैसी कार्रवाई करके दिखाओ? और अगर ऐसा है तो क्या भारत को इस ‘ट्रैप’ में फँसना चाहिए? पाकिस्तान, दरअसल, बरसों से एक सधी-सधाई नीति पर चल रहा है. उसका प्लान ‘ए’ हमेशा से रहा है बतछुरी यानी बात भी करते रहो और भारत में अातंकवादी षड्यंत्र भी रचते रहो. बात करके दुनिया को दिखाते रहो कि पाकिस्तान सारे विवादों को सुलझाने के लिए किस तरह बातचीत के रास्ते पर चल रहा है और साथ-साथ आतंकवाद के रूप में भारत के लिए सिरदर्द भी पैदा करते रहो. प्लान ‘बी’ यह कि बात अगर किसी तरह बन्द हो जाये तो अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का सवाल उठा कर उसे ‘द्विपक्षीय’ के बजाय अन्तरराष्ट्रीय बनाने की चेष्टा करो. और प्लान ‘सी’ यह कि बीच-बीच में करगिल जैसी कोशिश करके यह भी देखो कि पिछले युद्धों में मिली हार का बदला लिया जा सकता है या नहीं? इसके जवाब में भारत की नीति क्या रही है? सिर्फ़ एक यानी बातचीत करके झगड़े सुलझाये जाएँ और ‘मानवीय सम्पर्क’ और व्यापार बढ़ा कर जनता के बीच खाई कम की जाती रहे. लेकिन समय ने बार-बार सिखाया है कि पाकिस्तान से केवल बातचीत करते रहना कोई अक़्लमंदी की बात नहीं है. बातचीत कर आप लगातार पिटते रहें, अपनी जनता के सामने बेबस साबित होते रहें, यह कौन-सी अक़्लमंदी? फिर बात तो आप सरकार से करते हैं. लेकिन चाबी पीछे से पाकिस्तानी सेना और आइएसआइ के हाथ में होती है. सरकार तो वहाँ बस एक मुखौटा भर है, जो अन्तरराष्ट्रीय और कूटनीतिक मंचों पर कठपुतली की तरह पेश होती रहती है. लेकिन पर्दे के पीछे फ़ैसले कुछ और होते हैं.
बेनज़ीर की किताब, नवाज़ का बयान!
पर्दे के पीछे के इस खेल को ख़ुद पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो अपनी किताब ‘बेनज़ीर भुट्टो: रिकन्सिलिएशन, इसलाम, डेमोक्रेसी ऐंड द वेस्ट’ में उजागर कर चुकी हैं. इसके बाद किसी शक-शुबहे की कहाँ गुंजाइश रह जाती है. बेनज़ीर ने ख़ुद लिखा है कि वह भारत-पाक के दो युवा और उदार नेताओं का दौर था, वह और राजीव गाँधी दोनों देशों के बीच सम्बन्ध सुधारने की तरफ़ तेज़ी से आगे बढ़ रहे थे, लेकिन आइएसआइ इसमें अड़ंगे डालने में जुटी थी और यहाँ तक कि उसने बेनज़ीर को ‘भारतीय एजेंट’ तक कह कर बदनाम करने की कोशिश की. और यह एक बार नहीं हुआ. बेनज़ीर और राजीव की कोशिशों के दस साल बाद फ़रवरी 1999 में अटलबिहारी वाजपेयी और नवाज़ शरीफ़ के बीच ऐसी ही पहल शुरू हुई. लेकिन हुआ क्या? लाहौर यात्रा की गर्मजोशी अभी माहौल में ताज़ा ही थी कि तीन महीने के भीतर करगिल हो गया! क्योंकि सेना-प्रमुख जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ कोई दोस्ती नहीं चाहते थे! इस बार नवाज़ शरीफ़ का बयान आया कि करगिल के बारे में तो उन्हें वाजपेयी जी के फ़ोन से ही पता चला! पाकिस्तानी सत्ता तंत्र में सेना और आइएसआइ की इस कुटिल सच्चाई का इससे बड़ा और क्या सबूत चाहिए!
क्या ऐसे होती है दोस्ती?
और तीसरी बार पीठ में छुरा तब घोंपा गया, जब ख़ुद मुशर्रफ़ राष्ट्रपति थे और सरकार, सेना, आइएसआइ तीनों की कमान उनके हाथ में थी. जुलाई 2001 में आगरा में वाजपेयी-मुशर्रफ़ मुलाक़ात हुई, बातचीत बनते-बनते अचानक क्यों उखड़ गयी, यह अब भी रहस्य के घेरे में है. लेकिन मुशर्रफ़ के आगरा दौरे के पाँच महीने के अन्दर ही संसद पर हमला हो गया! और देखिए. अप्रैल 2005 में क्रिकेट डिप्लोमेसी के बहाने मुशर्रफ़ फिर भारत आये, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके बीच फिर बड़ी अच्छी बात हुई. लेकिन हुआ क्या? छह महीने के भीतर ही, ऐन दीवाली के पहले दिल्ली के सरोजनी नगर में हुए आतंकी विस्फोटों में साठ से ज़्यादा लोग मारे गये. देखा आपने कि बात करके क्या मिला? एक लाइन का निष्कर्ष यह है कि पाकिस्तान से बात हो तो होश मत गँवाइए. उड़ने मत लगिए, बल्कि और चौकस रहिए. लेकिन पाकिस्तान को प्लान ‘बी’ का मौक़ा न मिले, इसलिए बातचीत तो बन्द करना भी अक़्लमंदी नहीं. बात तो करनी ही है, लेकिन बातें करने के साथ-साथ भारत को यह ज़रूर सोचना चाहिए कि वह बतछुरी का सही जवाब कैसे देता रहे. वह पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार से बात करते हुए वहाँ की सेना और आइएसआइ से कैसे निबटे? भारत को इसका कोई न कोई प्रभावी तरीक़ा ढूँढना ही होगा. लेकिन क्या वह तरीक़ा म्याँमार जैसा हो सकता है? शायद नहीं. हालाँकि कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि एक-दो बार ऐसी कार्रवाई सफलतापूर्वक कर दी गयी तो पाकिस्तान सबक़ सीख जायेगा और औक़ात में आ जायेगा. लेकिन यह तर्क सही नहीं है, वरना तो 1971 और फिर करगिल की शर्मनाक पराजयों के बाद पाकिस्तान को रास्ते पर आ ही जाना चाहिए था. दूसरी बात यह कि ऐसा कोई क़दम किसी बड़े युद्ध में भी बदल सकता है. आज की दुनिया में ताक़त आर्थिक विकास से आती है, युद्ध से नहीं, यह बात हमें याद रखनी होगी. इसीलिए भारत को ठंडे दिमाग़ से सोच-समझ कर अपनी पाकिस्तान नीति नये सिरे से तय करनी चाहिए. और ख़ास कर पाकिस्तान से उठ रहे आइएसआइएस के नये ख़तरे पर भी चौकस नज़रें रखनी चाहिए. जो पाकिस्तान एक तरफ़ अमेरिका को अपनी धरती से ‘आतंक के ख़िलाफ़ युद्ध’ के लिए सारी सुविधाएँ मुहैया करा रहा था, वही दूसरी तरफ़ अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन और दुनिया के सबसे बड़े आतंकी नेटवर्क अल क़ायदा के मुखिया उसामा बिन लादेन को अपनी सैनिक छावनी में छिपाये भी हुए था. ऐसे दोमुँहे पाकिस्तान पर आप कैसे भरोसा कर सकते हैं कि वह आपके ख़िलाफ़ आइएसआइएस को अपना नया हथियार बनाने की घिनौनी साज़िश नहीं रच रहा होगा! अभी पिछले दिनों पाकिस्तान में आइएसआइएस के उर्दू में छपे पर्चों के मिलने के बाद पूरी कहानी में इस नये पेंच को भला कैसे अनदेखा किया जा सकता है?